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Sunday, August 14, 2016

Udaan, उड़ान (स्वतंत्रता दिवस विशिष्ट), independence day special


दिसंबर की सर्दियों में बादलों को चीरता ,चमचमाता और चिढ़ाता हुआ फाइटर जेट "HAL तेजस" किसी सितारे की तरह अटखेलियां करता हुआ बेस की ओर लैंडिंग करने आ रहा था।
तेलंगाना के हकिमपेट में स्थित एयरफोर्स बेस क्रमांक २ पर तेजस की लैंडिंग हुई।
जेट से पायलट के रूप में , चेहरे पर सूर्य सी चमक, कद काठी पर शौर्य का तेज, आत्मविश्वास से परिपूर्ण, बगल में हेलमेट और आखों पर कला एविएटर चश्मा लगाये ट्रेनी अरुणिमा शर्मा बेस की ओर आगे बढ़ रही थी। यूँ प्रतीत ही रहा था मानो आकाश से स्वयं माँ दुर्गा अवतरित होते हुए जमीं को पदस्पर्श कर रहीं हों।
अरुणिमा के नाम के आगे कैडेट लगने में कुछ ही समय बाकी था, तेजस की बतौर pilatus phase ii की ट्रेनिंग के रूप में यह उसका आखिरी परिक्षण था।
लाखों नौजवानों की तरह देश की सेवा में शामिल होने वाली, अरुणिमा वो पहली "लड़की" थी जिसे आई.ए. एफ मैं बतौर फ्लाइंग कैडेट बनने का गौरव हासिल होने वाला था।
और अगली सुबह का सूरज, आरुणिमा की ज़िन्दगी में सबसे कीमती दिन लेकर आया, समहवन्न अतिश्योक्ति दिवस, के उप्लक्ष पर बेस के सभागृह में आई.ए. एफ चीफ "विक्रम राहा", ऑफिसर्स, ट्रेनीस, कैडेट्स और अपने बच्चों के कंधे पर सितारे लगाने का सौभाग्य लिए समस्त माता पिता एवं अभिभावक उपस्थित थे। चीफ द्वारा प्रदान किये स्टार्स को हांथों में लिए अरुणिमा अपने पिता आर.के. शर्मा की ओर आगे बढ़ी। बेटी के कंधे पर स्टार्स लगाते वक़्त शर्मा साब की आँखें गर्व से भर आयीं। सबसे मिलते वक़्त अरुणिमा की नजर कैप्टन राघवेंद्र पर पड़ी जो अपनी माँ के चरण स्पर्श कर रहे थे, अरुणिमा उन्हें स्तब्द आँखों से टकटकी लागए देखती रही। पिताजी के आवाज देने पर किसी गहरे चिंतन में दूर तक डूबी अरुणिमा वापस आयी और पिताजी को अपने प्लेन की जानकारी हेतु ले गयी।
अपनी जॉइनिंग से पहले, अरुणिमा को फ़ोर्स से घर जाने की कुछ दिनों की अनुमति मिली। घर पहुँचते ही अरुणिमा ने अपने ट्रेनिग में जीते मैडल औए कंधे पर लगे सितारों को अपनी स्वर्गवासी माँ की तस्वीर के सामने अर्पित किए और उन्हें प्रणाम किया।
अगली सुबह, घर के रख रखाव का जायजा लेने के बाद अरुणिमा अपने पिता के साथ उनके द्वारा पिछले 40 वर्षो से संचलित अनाथालय "आकांशा" के लिए निकल पड़ी।
रास्ते में लंबे ट्रैफिक जाम में फँसी, दाहिने हाँथ पर चल रही कंस्ट्रक्शन साईट के पास लेटी और रोती हुई बच्ची को देख रही थी जिसकी माँ साईट पर ईंट उठा रही थी। बच्ची को देखने में अरुणिमा इतनी मशगूल हो गयी थी की जाम खुलने के बाद पीछे की कारों के हॉर्न उसे सुनाई ह नहीं दे रहे थे, फिर पिताजी के झकझोरने पर उसने एक्सीलेटर पर पांव पड़ा।
आकांशा पहुँचते ही, गेट पर ,शर्मा साब की तरह 40 वर्षों से आकांशा की सेवा कर रहे रघु काका ने अरुणिमा का जोरदार स्वागत किया। रघु काका के चरणस्पर्श कर अरुणिमा, आकांशा में फल फूल रहे तकरीबन सवा सौ बच्चों से मिली।
दीदी को देख सभी बच्चों का उत्साह परवान पर था। हर एक को तोहफा देने और सभी को जीवन में कुछ हासिल करने की प्रेरणा देने के बाद ,अरुणिमा वापस घर लौट आई।
65 वर्षीय और डायबिटीज के मरीज , शर्मा साब की धर्मपत्नी वसुंधरा के जाने के बाद अरुणिमा ने ही उनका पूरा ख्याल रखा था। लेकिन अरुणिमा के फ़ोर्स में जाने के बाद शर्मा साब अपनी दवाइयों के प्रति लापरवाह रहते। जिसका पूरा हिसाब उनकी HBA1c की रिपोर्ट अरुणिमा देख रही थी। रिपोर्ट के अनुसार ,जब शर्मा साब को लेकर अरुणिमा उनके पुराने डॉक्टर के यहाँ पहुंची तोह सारे जांच परिक्षण के बाद डॉक्टर के ओपिनियंस ने अरुणिमा को बराबरी से हैरत और दुखी कर दिया, किडनी पर जबरदस्त डायबिटीज के प्रहार से उन्हें डायलिसिस पर रहना था।
सारे इंतजामात करने के बाद और शर्मा साब से दवाइयों के प्रति सतर्कता बरतने का वादा लिए, अरुणिमा, फ़ोर्स से आये आर्डर के अनुसार वापस बेस लौट गयी।
जहाँ एक तरफ अरुणिमा अपनी जॉइनिंग के उपरांत पहले टास्क पर पूरी मेहनत कर रही थी। वहीँ शर्मा साब की हालत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही थी। अरुणिमा का अपने लक्ष्य के प्रति कोई खलल पैदा न हो इसलिए हार बार फ़ोन पर शर्मा साब अरुणिमा को सब खैरियत का झूठा दिलासा देते रहे और रघु को भी वास्तविकता बताने से मना किया था।
आखिरकार शर्मा साब की बेहद गम्भिर हालत ने रघु को अरुणिमा को बुलाने पर मजबूर कर दिया। अपनी मिशन को बीच में ही जब अरुणिमा जब तक अस्पताल पहुंची तब तक शर्मा जी दुनिया से विदा ले चुके थे।
बेटे जैसे बेटी पिताजी का अंतिम संस्कार कर घर पहुंची और माँ की फ़ोटो के बगल में पिताजी की तस्वीर लगाते वक़्त चट्टानी हौसले और वज्र का जिगर रखने वाली अरुणिमा मोम की तरह पिघलते हुए रोने लगी। रोते रोते अरुणिमा के मुख से एक ही बात निकल रही ,
की आज मैं फिर से"अनाथ" हो गयी।
उसे देख पास खड़े रघु काका की आँखें झुकी हुई थीं।
शर्मा साब को दी हुई कसम उनके जाने के साथ ख़त्म हुई, इस बात का ख्याल करते हुए, अरुणिमा ने रघु काका से सालों से मन में दबा हुआ प्रश्न पुछा, की "मैं अनाथालय कैसे पहुंची????????
रघु काका , अरुणिमा की कसक को बर्दाश्त न कर सके और शर्मा साब से माफ़ी मांगते हुए, अरुणिमा को बताया की ,,,,आज से तकरीबन 15 साल पहले निसंतान शर्मा साब और वसुंधरा भाभी तुम्हे आकांशा से घर ले गए थे।
अरुणिमा अचानक बोल पड़ी, यह तोह मैं जानती हूँ, मुझे इतना बता दीजिये मैं उन्हें कहाँ और कैसे मिली???
रघु काका ने बताया की , आकांशा से कुछ 3 किलोमीटर की दूरी पर जो नेशनल हाईवे है, उसी के पास से एक शाम साब अनाथालय का सामान लेकर लौट रहे थे, गाडी ख़राब होने की वजह से मैकेनिक को फ़ोन करने के बाद इंतज़ार कर रहे थे, इतने में पास सटी झाड़ियों से तुम्हारी आवाज सुन तुम्हारे पास पहुंचे और ,,,,,,,,तुम्हे आकांशा ले आये।
कुछ सालों बाद, तुम्हारी सेना की प्रति जिज्ञासा देख , साब और भाभी तुम्हे घर ले गए, तुम्हारा जूनून और साब की देख रख ,तुम्हारे कंधो पर लगे सितारे बयां करते हैं।
अरुणिमा बिटिया, मैं साब की सौगंध खाकर कहता हैं, बस इतना ही जनता हूँ, की उन झाड़ियों में तुम्हे कोई छोड़ गया था।
अगली सुबह रघु काका के चरण स्पर्श कर अरुणिमा , बेस के लिए रवाना हो गयी, माता पिता से भी बढ़कर शर्मा साब और माँ वसुंधरा की तस्वीर जहन में बसाये अरुणिमा , ने सौगन्ध ली की अपनी आगे की ज़िन्दगी की हर सांस वो नारी शक्ति के उत्थान में लगा देगीI
विकास पाण्डेय (१४/८/१६, १०.५४)

Saturday, August 6, 2016

friendship day; फ्रेंडशिप डे


राघव, cbse स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाला एक बेहद, अत्यंत ,,,,,अंतर्मुखी छात्र था।
उसके अन्तर्मुखीपन की वजह , अच्छी मंशा से दी हुई बचपन की एक सीख को गलत ढंग से आत्मसात करना थी।
सीख थी" बुरे वक़्त में काम आने वाले ही अच्छे और सच्चे मित्र होते हैं",,,,,,,,बाकी सुनहरे वक़्त में तोह सब मौज उड़ाते है।
इस वाक्यांश ने राघव पर इतना गहरा असर किया था की वो हर मिलने वाले शक्श को स्वार्थ और मतलब के दृश्टिकोण से ही देखता था, हार बार वह सिर्फ और सिर्फ यह सुनिश्ति करने के गुंताड़े में रहता की कौन मेरे कितने काम आ रहा है।
उसकी इस सोच की कसौटी पर केवल दो ही लोग खरे उतरे थे, सिद्धार्थ और गरिमा, राघव के साथ बचपन से स्कूल में पढ़ने वाले, ये दोनों राघव की शुरू से ही मदद करते आ रहे थे, और सोच के मुताबिक राघव को चेक करने से फुरसत ही कहाँ थी की वो इनकी मदद करे।
फ्रेंडशिप डे का दिन था, हज़ारों की भीड़ से बने अपने मात्र दो दोस्तों के लिए राघव ने फ़्रेंडशिप बैंड खरीद लिए थे।
पहले, सिद्धार्थ और गरिमा मुझे विश करेंगे ,फिर मैं करूँगा, इस सोच के साथ राघव की सुबह से शाम हो गयी , हज़ारों बार मोबाइल चेक करने वाले राघव को वो दो मेसेज नहीं मिले जिसका उसे बेसब्री से इंतज़ार था।
हर एक पल पर सामने से मिलने वाले रिस्पांस को तौलने वाले राघव का ख़रीदे हुए फ्रेंडशिप बैंड्स को देख देख कर खून खौल रहा था।
गुस्से से तिलमिलाए राघव ने सिद्धार्थ और गरिमा को मन ही मन मतलबी और स्वार्थी घोषित करते हुए , दुश्मन जैसा मान लिया था।
शाम से रात होने को आई ,राघव के मोबाइल का इनबॉक् खाली का खाली ही रहा, फ़्रेंडशिप डे की समाप्ति को केवल 10 मिनट ही बाकी थे, राघव ने दोस्ती तोड़ने के उद्देश्य से सिद्धार्थ को फ़ोन किया, मोबाइल बंद मिला! घर पर कई घंटियों के बाद सिद्धार्थ के घर के नौकर ने फ़ोन उठाया और जो कुछ बताया उससे राघव की नींद और चैन सब उड़ गया।
कोचिंग से लौटते वक़्त , साइकिल पर सवार सिद्धार्थ को सामने से आती कार की जबरदस्त टक्कर से गंभीर चोटें आयीं थी , और वह हॉस्पिटल के icu में भर्ती था। नौकर ने ये भी बताया की,,,,,
सिद्धार्थ को देखने जा रही गरिमा को रास्ते में मिले फ़ोन में यह खबर मिली की उसकी मम्मी को हार्ट अटैक आ गया है, उलटे पावँ भागी गरिमा के पापा मम्मी को हॉस्पिटल ले जा रहे हैं, इत्तेफ़ाकन गरिमा की मम्मी भी उसी हॉस्पिटल में एडमिट थीं, जिसमे सिद्धार्थ भर्ती था।
पूरी रात खुद को कोसता हुआ राघव अगली सुबह का सूरज निकलते ही ,हॉस्पिटल को ओर भागा। कांच के बाहर से सिद्धार्थ को झांकते हुए राघव अपने न रुकने वाले आसुओं को पोंछ ने की कोशिश कर रहा था।
थोड़ी देर के लिए मिलने आई गरिमा भी सिद्धार्थ के पास ही बैठी थी।
बहुत हिम्मत करके राघव ,सिद्धार्थ के नजदीक पहुंचा उसका हाँथ पकड़कर और रोती हुई गरिमा को देखते हुए ,निशब्द राघव बस यही सोच रहा था की ,इनके बुरे वक़्त में इनके साथ न रहकर उसने अपनी दोस्ती का अपमान किया है।
कुछ देर बाद , गरिमा का ढांढस बंधाते हुए ,राघव ने अपनी जेब से फ़्रेंडशिप बैंड निकाला और दोनों को बांधते हुए , मन ही मन यह सौगंध ली की अब सारी जिंदगी वह दूसरों की मदद के रूप में सामने आएगा।
इस सौगंध के साथ राघव चुपचाप अपने घर लौट गया, अपने रूम में पहुंचते ही उसने अपनी डायरी जला दी जिसमे उसने स्वार्थ रुपी हुए कामों की व्याख्या की थी।
नई डॉयरी के उद्घाटन के रूप में उसने पहले पन्ने पर पहले शब्द लिखे,,,,जो थे,,,,,,"अ फ्रेंडशिप डे".

global war(n)ing; ग्लोबल वॉर(निं)ग


सन् 2020,
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के भनपुरी इलाके की सत्यम कॉलोनी में स्थित अपने घर में 65 वर्षीय रामानंद शर्माजी की जून माह की झुलसाने वाली गर्मी में रात में अचानक 2 बजे नींद टूट गयी।
पसीने से लत पथ शर्माजी गमछा उठाये इस आस में की बहार थोड़ी राहत मिलेगी, कॉलोनी के बीचों बीच स्थित भगवान शंकर के मंदिर के चबूतरे में जाकर बैठ गए।
यहाँ वहां नजर घुमाने पर देखा तोह कॉलोनी वासी एयर कंडीशनर की हवा बंद होने पर जल बिन मछली की तरह तड़पते हुए ,चीख पुकार कर रहे हैं। छोटे छोटे बच्चे जो ac में ही पैदा हुए थे, टमाटर की तरह लाल हो रहे हैं। अपने प्रभु से बिजली वापस लाने की प्रार्थना में शर्माजी लीन होने के प्रयास में भयंकर गर्मी की वजह स विफल रहे।
थोड़ी देर तक राहत न मिलने पर कॉलोनी के बाहर, बिलासपुर हाईवे से सटे फूटपाथ पर चलते हुए 1 किमी की दूरी पर शर्माजी बंजारी माता के मंदिर पहुंचे। सोचा यहां थोडा खुलापन है, यहाँ शायद पसीना बहना बंद हो!
,,,,,,,लेकिन जून माह की गर्मी और भनपुरी के समीप छत्तीसगढ़ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन के उरला इलाके में स्थित सैकड़ों स्टील की कंपनियों से निकलने वाली तपन की जुगलबंदी ने 90 किलो के शर्माजी के बदन से पसीने के नल चालू रखे।
आख़िरकार थक हारकर, कुम्भकर्णीय मुहूर्त्त में शर्माजी की अपने घर के बरामदे में जैसे तैसे आँख लगी।
कुछ ही देर में, सूर्यदेव घर के अंदर घुसते हुए और शर्माजी की बनियान खींचते हुए गुड मॉर्निंग करने पहुँच गए।
बंद आँखें लिए, नहा धोकर पूजा अर्चना करके ,शर्माजी पेपर पढ़ने बैठे ही थे, की घर के बाहर खड़े कॉलोनी के पुरुषवर्ग की आवाजें शर्माजी को बाहर खींच लायीं।
सोसाइटी के वरिष्ठ अध्यक्ष होने के नाते, पूरा जमघट और बिजली न आने का आक्रोश लेकर शर्माजी पास ही के इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के ऑफिस पहुंचे।
53 डिग्री के पारे ने कॉलोनीवासियों को पूरा राशन पानी लेकर बोर्ड के सब इंजीनियर पर चढ़ने पर मजबूर कर दिया।
बिजली ऑफिस की टीम द्वारा कॉलोनी के जर्जर पड़े ट्रांसफार्मर की मरम्मत करते ही ,कॉलोनी कूलर और ac के कंप्रेस्सरों की आवाज से गूँज उठी। यह मधुर आवाज सुनते ही राहत की अनुभूति हेतु सभी अपने गंतव्य की ओर बंदरों की तरह लपके।
कुछ देर उपरांत , शर्माजी को कैलाश मानसरोवर की यात्रा कराती कूलर की शीतल हवा अचानक रुक गयी!!
थोड़ी देर ही मैं क्रिकेट मैच के रीप्ले की तरह शर्माजी और सब इंजीनयर , सुबह की तरह फिर ट्रांसफार्मर को सुधारते हुए कर्मचारियों को तक रहे थे।
सुबह के आक्रोश का खेद जताते हुए, शर्माजी ने सब इंजीनियर को समझाने की कोशिश की ही थी की , चश्मा उतारकर आँखों में चुन चुनाते हुए पसीने को पोंछकर जब सब इंजीनियर ने तकनिकी समस्या के आंकड़े जैसे ही बताये, शर्माजी का ट्रांसफार्मर उड़ गया।
इंजीनियर ने बताया, आपकी कॉलोनी में कुल 84 घर हैं,
तीनसौ अस्सी टन की भार क्षमता वाला यह मासूम ट्रांसफॉर्मर आप लोगों का भार पिछले 35 सालों से उठा रहा है।
आज से महज 7 साल पहले ,जहाँ आपकी कॉलोनी में मात्र 11 ac लगे थे ,वही आज बढ़कर 77 हो गए हैं । इस लिहाज से जैसे ही पारा बढ़ते सब ac चालू करते हैं , इसकी सांस उखड जाती।
अब आप यह कहेंगे की एक ट्रांसफार्मर और लगवा दो, तोह यह देखिये उसके मेरे द्वारा दिए हुए आवेदन, पर आप लोगों ने ही नगर निगम से नक्शा पास करा करा कर ,जो मकान पे मकान धोंके हैं उसके बाद, कोई जगह ही कहाँ छोड़ी है दूसरे ट्रांसफॉर्मर लगने की !!!!!,
हर नया ac कॉलोनी में घुसते ही , इस बिचारे को शोषण की नजर से चिढ़ाता हुआ निकल जाता, और ये बेचारा दर के मारे उड़ जाता है।
~~~अब आप ही बताइये , दूसरा ट्रांसफार्मर कहाँ लगा दूं, !!!आपके सिर पर??????????.
निशब्द और स्तब्ध शर्माजी, विचारों के टोकरी अपने सर पर रखे चुपचाप अपने घर हो लिए, घर पर उनकी धर्मपत्नी कौशल्या चाय लाकर पास बैठीं।
और इतना ही कहा की आज अगर मेरे ,ब्रम्हा, विष्णु और महेश होते तोह यह समस्याएं कभी न आती।
एन्विरोमेंटल साइंस में पीएचडी , कौशल्या ने घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों को मद्देनजर रखते हुए 25 साल पहले अपनी नौकरी त्यागी थी। गृहस्थ जीवन में महारथ और काम में बेहद कुशल कौशल्या ने अपने ज़िन्दगी के तजुर्बे से शर्माजी के आँगन को अपनी मेहनत से संवारा था।
38 साल पहले ब्याह होकर आयीं और प्रकर्ति के प्रति असीम लगाव रखने वाली कौशल्या , सत्यम कॉलोनी के इर्द गिर्द लगे हजारों पेड़ पौधों को अपने बच्चों जैसा मानती और उनकी पूजा अर्चना करती आ रहीं थीं। उनमे से तीन वृक्ष कौशल्या और कॉलोनी की सभी महिलाओं के लिए वरदान रुपी प्रतीत होते, वे थे नीम , पीपल और बट। इन् तीनो का ही नाम कौशल्या ने ब्रम्हा, विष्णु और महेश रखा था।
वर्तमान में, बीतते समय के साथ बढ़ते पारे और बिजली की आंखमिचौली लोगों को हताहत करती रही, सितम्बर शुरू होने को आया और बारिश का नामोनिशान न था।
हलाकान गर्मी और बिजली की समस्या शर्माजी के दो पुत्रों, उनकी पत्नियां और नाती पोतों पर इस कदर प्रहार करती रही की घर का खुशहाल वातावरण भी खराब होने लगा था।
बारिश के लिए शर्माजी ने कॉलोनी में स्थित मंदिर में , भव्य यज्ञ का आयोजन कराया, दिन रात की प्रकांड पूजा पाठ के बावजूद गर्मी के तेवर कम न हुए।
21 दिनों के उपवास के बाद जब बारिश न आई तोह बदहाल शर्माजी भगवान शंकर के चरणों में गिरकर दया की भीख मांगने लगे। बोलने लगे, कहाँ हो प्रभु ? प्रकट हो, रहम करो!
इतने मे शर्माजी के कानो में पड़ती हुई एक दिव्या आवाज ने कहा,,"मैं यहीं था ,साक्षात् जीता जागता, हराभरा लहलहाता हुआ, पर तुम लोगों से देखा नहीं गया, काट कर फेंक दिया मुझे। ये मौसम मेरी सिर्फ चेतावनी है, अभी तोह मेरा कहर बाकी है।
शर्माजी को एहसास हुआ, कुछ सालों पहले कंस्ट्रक्शन के चलते उन्होंने सत्यम कॉलोनी के इर्द गिर्द लगे सभी पेड़ कटवा दिए थे। जिसमे कौशल्या के लिए ईश्वर रुपी पीपल, नीम और कॉलोनी के बीचों बीच लगा बट का पेड़ भी शामिल था, जिसे कटवाकर शर्माजी और कॉलोनी के लोगो ने भगवान शंकर का मंदिर निर्माण करवाया था।
शर्माजी और कॉलोनी के समस्त लोगो के रग रग में बहती हुई गर्मी ,प्रकर्ति पर हुए अत्याचारों के बदले में मिल रही ~~~~~~~~ग्लोबल वॉर(नि)ग~~~~~~~~~~~
का पल पल एहसास करा रही थी।

Tuesday, August 2, 2016

gizmo freak; गिज़मो फ्रीक


रोहन, शहर के जाने माने, प्रतिश्ठित, समृद्ध और शक्तिशाली उद्योगपति कपूर साहब की शहर के ही टॉप के इंग्लिश मीडियम स्कूल की बारवीं कक्षा में पढ़ने वाली एकलौती संतान थी।
लाजमी था, बचपन से ही रोहन सारे सुख, भौतिक संसाधनों और सुविधाओं के बीच पैदा और पला बढ़ा था।
कष्ट, दुःख, तकलीफें,परेशानियां और समस्याएं किसको कहते हैं, रोहन जानता ही नहीं था।
देर रात तक अपने 40 X 40 के आलीशान बैडरूम में बेड के सामने लगे 90 इंच के sony एल.ईडी में पसंदीदा इंग्लिश मूवीज देखे बिना रोहन को नींद नहीं आती थी।
सुबह रोहन के उठने से पहले,दाताराम जूस का गिलास लिए तैनात रहते थे, जूस ख़त्म करते ही jaguar की एक्सेसरीयो से लैस बाथरूम में लगे वाय-,फाय संचालित स्पीकरों में गाने सुनते हुए नहाकर रोहन बाहर आते ही भोला द्वारा हाँथ में पकड़ी हुई स्कूल ड्रेस पहनता था। साथ ही साथ उसका एप्पल 6 एस प्लस फ़ोन ,ब्लूटूथ से कनेक्टेड स्पीकरों पर सोशल मीडिया के अपडेट'स उसे सुनाते थे।
शुद्ध शाकाहारी भोजन से वंचित रोहन फ्रेंच फ्राइज का नाश्ता करने के बाद अपनी मर्सडीज़ x1 में बैठकर स्कूल चला जाता।
स्कूल के लंच ब्रेक में जब क्लासमेट्स जल्द टिफिन ख़त्म करके ग्राउंड में खेलने दौड़ पड़ते, तब रोहन छुपा के लाया हुआ, अपने sony PSP पर गेम्स खेलता रहता।
स्कूल के टीचरों द्वारा असाइनमेंट, प्रैक्टिकल नोटबुक, यूनिट टेस्ट, हाफ इयरली वगेरह में शून्य बटा सन्नाटा की स्थिति में पड़ती हुई डाटों को कनबहरी करने की अद्भुत कला को रोहन ने अपने अंदर जबरदस्त रूप से विकसित कर लिया था।
एग्जाम की कॉपियां भले ही जीरो से सुस्सजित हो,पर "कैंडी क्रश सागा" के सारे लेवल पार करने में रोहन को महारथ हासिल थी , स्कूल के समस्त टीचर्स रोहन को "टॉकिंग टॉम", प्रतीत होते थे। उनके कार्टून सैमसंग गैलेक्सी नोट 2 पर बना बना रोहन सोशल मीडिया पर पोस्ट करता रहता ।
परीक्षाओं की घडी जब-जब आती तब-तब रोहन की उँगलियों और सर में भयंकर दर्द होता, क्योंकि लिखने की तुलना में वो अपने आप को मोबाइल और लैपटॉप में टाइपिंग करने में ज्यादा कम्फ़र्टेबल महसूस करता।
उद्योग की असीम व्यस्तता में लीन कपूर साहब और किटी पार्टियों से जब कभी फुरसत मिलती ,तब कभी कभार रोहन को मम्मी पापा के और उनको रोहन के दर्शन होते थे। इस औपचरिक्ता की रोहन को कभी जरुरत महसूस नहीं होती थी, क्योंकि वो अपने कुछ बहुत पक्के दोस्तों के साथ हमेशा मशगूल रहता था।
यह दोस्त उसका साथ कभी नहीं छोड़ते थे , वे थे फेसबुक, वॉट्सएप्प, ट्विटर, लाइन और वाइबर।
कॉलोनी के दोस्त जब रोहन को क्रिकेट खेलने के आवाज देते, तब पिछले साल हिम्मत करके क्रिकेट का एक गेम खेलते वक़्त फूली हुई सांस को याद करके , रोहन उन्हें मना कर देता और यह कहकर की मुझे अभी GTA san Andreas का बारवां लेवल पार करना है।
बारवीं की कॉमर्स संकाय की मार्कशीट पर 47% का आंकड़ा लेकर और वेइइंग मशीन पर वजन का 102 किलो का आकड़ा लेकर वक़्त रोहन उसकी बढ़ती हुई गैजेट्स की सूची के साथ घसीटते हुआ आगे ले जा रहा था।
टेक्नोलॉजी के इस युग में ऐसी कोई गैजेट नहीं थी जो इसी युग में पले बढे रोहन के पास न थी। उनसे थोड़ी देर की भी दूरी रोहन बर्दाश्त नहीं कर सकता था।
शहर के ही बेस्ट आर्ट्स और कॉमर्स कॉलेज में प्रवेश की औपचारिकताएं अपने मैनेजर से ख़त्म करवाके , कपूर साब अपने बेटे रोहन को चीन की राजधानी शेंघाई कुछ दिनों के लिए व्यापार के गुण सिखाने ले गए। शेंघाई न सिर्फ चीन बल्कि पूरी दुनिया में गैजेट्स की राजधानी के नाम से प्रसिद्ध थी ।
इसी प्रसिद्धि का पूरा लाभ लेते हुए रोहन व्यापार को फालतू समझते हुए, और ढेर सारे गडेट्स लेकर अपने शहर वापस लौट आया।
चीन की यात्रा में बिज़नेस से समन्धित एक टेंडर पास होने की ख़ुशी में कपूर साब ने अपने बंगले में एक शानदार पार्टी दी, रोहन को मजबूरन सबसे स्मार्टफोन की ओर देखते हए मिलना पड़ रहा था। ...........थोड़ी दूर से दोस्त की आवाज ने रोहन का ध्यान खींचा।
सबसे मिलते हुए , कोल्ड ड्रिंक्स पे कोल्ड ड्रिंक्स पीते हुए रोहन का वक़्त बीत रहा था,,,,,,,मिसिज़ कपूर के फ्रेंड्स के आग्रह करने पर उन्होंने रोहन को उनसे मिलवाने के लिए मिसिज़ कपूर ने अपने नौकर को रोहन को बुलाने के लिए कहा।
कुछ ही मिन्टो में ना आने पर और पास ही लगी भीड़ की ओर नजर पड़ते ही मिसिज़ कपूर और उनके फ़्रैंडस ने दौड़ लगाई । भीड़ को हटाने के बाद ,रोहन को जमीन पर पड़े देकब देख उनकी हालत ख़राब हो गयी।
रोहन को एकाएक जबरदस्त चक्कर आने की वजह से सिर और कंधो पर गंभी चोटें आई थी ।
पास ही खड़े गंभीर रूप से घबराये हुए कपूर साब ने पार्टी मैं आये हुए अपने दोस्त और शहर के जाने मने एम्.डी इन मेडिसिन के डॉक्टर राजन द्वारा चेक अप करवाया।
डॉ राजन ने रोहन की फ़ौरन अस्पताल ले जाकर तमाम टेस्ट करवाये। जिनकी रेपिर्ट्स ने अगली सुबह कपूर साब के होश उड़ा दिए। रोहन की ज़िन्दगी के रिपोर्ट कार्ड में इतने बड़े आकंड़े उनके सामने थे।
महज 18 साल की उम्र में रोहन के टेस्ट्स की रिपोर्ट्स में रीडिंग्स के कांटे मीटर फाड़ फाड़कर बहार आ रहे।
सब चिंताजनक फिगर 485 का था जो रोहन की ब्लड शुगर का था।
मेडिकल रिपोर्ट्स खींच खींचकर अपने बेटे रोहन के प्रति लापरवाही बरतने पर मिस्टर और मिसिज़ कपूर पर झन्नाटेदार झापड़ रसीद कर रही थी।
कपूर साब से गहरी मित्रता और रोहन की जीवनशैली से शुरू से ही वाकिफ डॉ राजन ने कमर कस्ते हुए उन्हें सुझाव दिया की , इससे पहले रोहन की मेडिकल कंडीशन्स और गंभीर रूप ले, उसे सबसे पहले उसकी वर्तमान दिनचर्या और उसी में समाये हुए सबसे घातक शत्रु गैजेट्स और जंक फ़ूड से अलग करना होगा।
अस्पताल में बने इंटेंसिव केअर यूनिट की तरह "किसी भी धुन,लत या नशे से मुक्ति दिलाने के लिए रोहन को देहरादून स्थित स्पेशल रिहैबिलिटेशन सेंटर में कुछ समय के लिए स्थानातरित करने का सुझाव डॉ राजन ने कपूर साब को दिया।
इस कठिन सुझाव के प्रति कपूर साब के सहयोग और रोहन के लाख इंकार के बावजूद उसे सेंटर शिफ्ट कर दिया गया।
वास्तविक दुनिया से पूर्णतः वंचित और वर्चुअल दुनिया में जीने वाले रोहन को सेंटर पहुँचते ही न तो मम्मी पापा और न किसी दोस्त की याद आ रही थी, क्यूंकि उसका परिवार और पूरी दुनिया उसके गैजेट्स थे,जिनकी अनुपस्थिति की तड़पन रोहन उर पूरे सेंटर को हलाकान कर रही थी।
पूरे 2 दिनोपरांत रोहन का चिड़चिड़ापन पूरे परवान पर था, क्यूंकि 2 दिनों से उसे सेंटर, वास्तविक जिंदगी की हकीकतों और उन क्रियाओं से अवगत करा रहा था जो रोहन ने पहले कभी नहीं देखि थी।
सेंटर की सख्त शैली में शामिल क्रियाएँ ,जैसे प्रातः 4 बजे उठाकर 2 घंटे का योग, फिर 2 किमी की चलयात्रा, साफ़ स्वच्छ एवं शाकाहारी भोजन ,फल, और क्रिएटिव एक्टिविटी जैसे पेंटिंग, पोट्टेरि, घुड़सवारी, गार्डनिंग, खेलकूद, वर्जिस इत्यादि और किसी भी प्रकार के नुकसानदायक भौतिक संसाधन का पूर्ण वर्जिकरण, रोहन की आत्मा कंपा रहे थे।
कुछ दिनों के बाद रोहन का हेल्थ स्टेटस लेने पहुंचे डॉ राजन के माथे से ac में तब पसीन निकलना शुरू हुआ ,जब उन्होंने देखा की रोहन की हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है, देश के बेहतरीन डॉक्टरों के ट्रीटमेंट 
और सेंटर की शानदार केअर के बाद भी रोहन में फिजिकल से कहीं ज्यादा मेन्टल/न्यूरोलॉजिकल,,, डिस्टर्बेंस/डिसऑर्डर आ रहे हैं।
रोहन से मिलने की चेष्टा के बाद जब डॉ राजन रोहन के सामने पहुंचे तोह इन्हें देख , रोहन उनके पाँव पकड़ते हुए, गिड़गिड़ाते हुए अपने गैजेट्स की मान्ग करता रहा। सब कुछ मन होने पर सिर्फ एक बार के लिए रोहन ने अपने स्मार्टफोन की मान्ग की। 
रिश्ते में न सही ,पर अपने बेटे जैसे रोहन की हालत डॉ राजन से देखि नहीं जा रही थी,इसलिये सेंटर के सख्त नियम और कपूर साब की शख्सियत के बल पर , पहली बार सेंटर के पेशेंट सेक्शन में अच्छी तरह पैक करवा कर केवल 10 मिन्टो के लिए किसी स्मार्टफोन को लाया गया था।
स्मार्टफोन के साथ आये मिस्टर और मिसिज़ कपूर वन साइडेड कांचं से अपने बेटे को देख रहे थे।
अपने फ़ोन को हांथों में देख रोहन के आंसूं रुक नहीं रहे थे। कुछ देर इस्तेमाल करने में बाद रोहन ने चैन की सांस लेते हुए अपना फ़ोन वापस कर दिया। और अपने दुर्बल पड़ चुके शारीर और हौसले को लिए रोहन चुपचाप अपने कमरे में लौट गया।
डॉ राजन मीटिंग के सिलसिले में सेंटर के पास स्थित गेस्ट हाउस में रुके रहे, मिस्टर कपूर ने बिज़नेस के सिलसिले में सिंगापुर की फ्लाइट पकड़ी और मिसिज़ कपूर भी शहर लौट गयीं।
उसी रात के ठीक तीन बजे फ़ोन की घंटी और फ़ोन में मिले मेसेज सुनने के बाद ,डॉ राजन बिजली से भी तेज गति से सेंटर की ओर भागे, रोहन को डॉक्टरों से घिरा हुआ देख और उनके कमेंटस ने डॉ राजन के होश उड़ा दिए।
रोहन ने कॉमन टॉयलेट रूम में रखी एसिड की पूरी पौन लीटर की बोतल पी ली थी। और स्पेशलिस्टस के मुताबिक सीवियर डायबिटिक और मेडिकल कंडीशन्स के चलते रोहन को बचाना नामुमकिन था।
थोड़ी देर में हुआ भी वही, रोहन तड़पते हुए अपने प्राण त्याग चुका था। हलक में अटकी हुई सांस लेकर डॉ राजन सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे की इस खबर का सामना वो कपूर साब से कैसे कराएंगे?
अगली सुबह खबर मिलते ही मिस्टर और मिसिज़ कपूर का शारीर, सोच और साँसे सुन्न पड़ चुकी थी ।अपने हज़ारों करोडों के कारोबार को भविष्य में सँभालने वाली एकलौती संतान को खोने का दर्द उनके लिए असहनीय था।
गतिवान वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता, उसके बीतते तेरह दिनोपरांत , कपूर साब रोहन के रूम में लगी उसकी तस्वीर को निहारते हुए यह सोच रहे थे जिस आत्मीयता और पालन पोषण की रोहन को जरुरत थी , उससे वंचित रखकर उन्होंने कितना बड़ा पाप किया है।
इतने में ही सेंटर द्वारा लौटाया हुआ रोहन का फ़ोन कपूर साब द्वारा ऑन करते ही नोटिफिक्शन्स से बज उठा। फेसबुक ओपन करते ही कपूर साब ने देखा ,रोहन ने सेंटर से अपनी आखिरी सेल्फी पोस्ट की थी । साथ में लिखा था
"" फीलिंग बोर विथ दिस लाइफ, अपना ख्याल रखना मेरी गैजेट्स ,टाटा""।
मेसेज को देखने के बाद,कपूर साब गैजेट्स से सजे हुए रूम को देखकर नम आँखों से एक ही बात सोच रहे थे की, उन्होंने रोहन को इंसान बनाने की बजाए महज एक चलता फिरता "गिज़मो फ्रीक" बना दिया था।
गिज़मो फ्रीक

Thursday, July 28, 2016

The great manager; महा(न)-प्रबंधक


कुछ समय के लिये राहत लेकर आई मार्च माह की ठण्ड ,दबे पावँ गर्मी को न्योता देते हुए खिसकने की कोशिश में थी।
जबलपुर संभाग के समीप जिला कटनी के सागर कॉलोनी इलाके में स्थित अपने घर से 55 बर्षीय " हरिनंदन दुबे" सुबह के 10 बजे अपने कार्यस्थल गोल बाजार स्थित "भारतीय स्टेट बैंक" शाखा के लिए निकल पड़े।
कटनी की गोल बाजार की एस बी आई शाखा प्रदेश के सबसे व्यस्ततम शाखाओं में आती थी। जिसमे जहां एक तरफ व्यापारी, राजनेताओं और प्रशासन का दबदबा था वहीँ दूसरी ओर बैंक के टारगेट सिस्टम का असीम प्रेशर ,स्टाफ की सांस गिनता था।
दुबेजी, शाखा में असिस्टेंट मेनेजर (बैंकिंग) और सबसे सीनियर स्टाफ के रूप में पदस्थ थे। बड़े बेटे अरविन्द के बिल्डरशिप के सपने और छोटे बेटे सुशिल के बिज़नेस आइडियाज, सर्विस क्लास की सोच रखने वाले दुबेजी के तनाव के हमेशा मुख्य कारण बने रहते थे। ऊपर से नैकरी का प्रेशर उनकी बीपी और शुगर की रीडिंग बढ़ाता रहता था।
बेटों के सेटल होने की, शादी की, विवादित पुश्तैनी जमीन पर चल रहे केस की वजह से दुबेजी के 5 बहुत गहरे मित्र बन गए थे, जिनके नाम थे, फ्रस्टेशन-गुस्सा-चिंता-दुःख और चिड़चिड़ापन। यह पाँचों उनके साथ हमेशा रहते थे और बड़ी मेहनत से इन्होंने दुबेजी के मूल स्वाभाव को बेहद घातक बना दिया था।
सोमवार की दोपहर, शाखा में पदस्थ वर्तमान प्रबंधक के तबादले के साथ "कृष्ण कुमार अग्रवाल" के नए प्रबंधक के रूप में शाखा आगमन का समाचार लेकर आई।
दुबेजी को अपने अब तक के कार्यकाल में एक से एक प्रबधकों के साथ काम करने का चट्टानी तजुर्बा था।
कुछ दिनोपरांत छोटे कद के, चेहरे पर शांतिय मुस्कान, भवमुक्त और समुन्दर सी गहराई वाली शख्सियत लिए 46 वर्षीय "अग्रवाल साहब" ने शाखा में प्रवेश लिया और समस्त स्टाफ मेंबर्स को संबोधित किया।
दुबेजी की उम्र और अनुभवों का लिहाज करके और उनसे सीखने के नजरिये से अग्रवाल साहब ने शाखा प्रबंधक के रूप में शाखा का संचालन सुचारू रूप से शुरू किया।
बीतते वक़्त के साथ ,दुबेजी पल पल अपने पाचों मित्रों से अग्रवाल साहब को अवगत कराते रहे।
रोजाना सर चढ़के बोलते काम के प्रेशर से हलाकान दुबेजी की समस्याओं का अग्रवाल साहब बड़ी सहजता,धैर्यता और मुस्कान के साथ हल करते रहे।
अग्रवाल साहब के सरल स्वभाव और काम के प्रति जबरदस्त कुशलता देख ,दुबेजी अपनी पारिवारिक चिंताओं का रोना भी अग्रवाल साहब के सामने रोते रहे। शख्सियत के अनुकूल अग्रवाल साहब ,दुबेजी का ढांढस बंधाते रहे।
दुबेजी ,अग्रवाल साहब के परिवार के बारे में बस इतना ही जानते थे की वे अपनी पत्नी सुषमा और दो जुड़वाँ बेटियों (रेखा और गुंजन) के साथ रहते हैं।
गतिवान समय गुजरते हुए और डेढ़ वर्ष समाप्त करते हुए एक बार फिर मार्च का भारी महीना लेकर आया। शाखा में मार्च माह में ऑडिट और क्लोजिंग स्टाफ के ऊपर प्रेशर की आतिशबाजियां कर रहा था। वहीँ अग्रवाल साहब पुरी तैयारी से लैस थे।
माह के बीच में दुबेजी के बड़े बेटे के शहर के नामी बिल्डर से बढ़ती विवस की स्थिति ने उन्हें छुट्टी लेने के लिए मजबूर कर दिया।
अग्रवाल साहब ने अपनी टीम और दुबेजी की अनुपस्थिति में मार्च माह का न सिर्फ डटकर मुक़ाबला किया बल्कि ऑडिट और क्लोजिंग को बेहतरीन अंजाम दिया।
चिन्तिय अवस्था में लौटते दुबेजी का अग्रवाल साहब ने अपनी सुप्रसिद्ध मुस्कान के साथ स्वागत किया।
लगभग 2 वर्ष बाद , अग्रवाल साहब के प्रमोशन और तबादले की खबर शाखा पहुंची। उनके साथ बिताये सफ़र का चिंतन करते हुए और अचरज से भरते दुबेजी को ख्याल आया की इन 3 सालों में अग्रवाल साहब के परिवार से तोह मिले ही नहीं !
अग्रवाल साहब की गृहस्थी के स्थानातरण हेतु ,दुबेजी उनकी मदद हेतु उनके घर पहुंचे। दोनों गोल बाजार शाखा में हुई तमाम गतिविधियों पर चर्चा करते रहे और चुटकियाँ लेते रहे।
इसी बीच अग्रवाल साहब ने अपनी पत्नी को आवाज और रेखा और गुंजन को बुलाने कहा।
बाहर आयीं अग्रवाल साहब की दोनों बेटियों को देखकर ,दुबेजी स्तब्ध रह गए, शरीर ठंडा और सुन्न पड़ गया, पैरों के नीचे जमीन और सर पर आसमान ना रहा, हलक में अटकी हुई सांस के साथ वे निशब्द बैठे रहे।
अग्रवाल साहब की दोनों बेटियां मानसिक और शारीरिक रूप से पूर्णतः विकलांग थीं। जिनका ख्याल अग्रवाल साहब और उनकी पत्नी ने बहुत अच्छे ढंग से रखा था।
उन्हें देखकर दुबेजी की आखों के सामने पिछले 3 साल का पूरा फ्लैशबैक चल रहा था। उस समय घडी का एक एक सेकंड उन्हें बता रहा था वो कैसे सर के सामने अपने छोटी मोटी तकलीफें बताते थे और सर उस समय कितनी आसानी से मुस्कुराते हुए उन्हें हल करते थे। पूरे तीन सालों में साहब ने कभी अपना गम दुबेजी को कभी बयां नहीं किया, बल्कि उल्टा अपनी जिम्मेदारियों और कार्यों को पूरी जिंदादिली के साथ अंजाम देते रहे।
उस पल में कृष्ण कुमार अग्रवाल,दुबेजी के सामने महाभारत की रण भूमि मैं अर्जुन को अपना विराट रूप दिखानेे वाले भगवान श्री कृष्ण की तरह प्रतीत हो रहे थे।
अगली भोर ,अग्रवाल साहब अपने नए कार्यस्थल "जबलपुर के सिविल लाइन्स स्थित सबसे व्यस्ततम एस. बी.आई शाखा में पदस्थ होने के लिए कटनी स्टेशन पर अपने परिवार के साथ पहुंचे। उन्हें विदाई देने दुबेजी के साथ शाखा के लगभग सभी स्टाफ मेंबर्स पहुंचे थे।
दुबेजी अग्रवाल साहब को गले लगाते वक़्त अपने अश्रुओं के सैलाब की रोक न सके। एक बार फिर वही मुस्कान के साहब ने दुबेजी का ढांढस बंधाया। और सबसे विदा ली।
अगले दिन शाखा में पहुंचकर अग्रवाल साहब की कुर्सी को देख ,दुबेजी के मुख से एक ही बात निकली की साहब ना ही सिर्फ शाखा परतुं जिंदगी के भी महा(न) प्रबंधक हैं।

selfie; सेल्फी

नीरा जबलपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में अपने मम्मी पापा की लाड़ली छोटी बेटी थी, या यूँ कहें अपने पापा का बेटा थी।
देखने , हाव-भाव में तेज तर्राट और पढाई में बेहद होशियार नीरा , धूमकेतु की गति से बढ़ने वाले भौतिक संसाधनों से लैस के दौर से गुजर रही थी।

लेकिन इस दौर के सबसे प्रभावशाली शस्त्र "स्मार्टफोन" से वो अभी तक वंचित थी।
मम्मी पापा के सपने पूरे करने और मानसिक रूप से विक्षिप्त बड़ी बहन के इलाज के खातिर ,नीरा अपने सपनो को अपने अंदर ही रखते हुए आगे बढ़ रही थी।

फिर एक रोज़ एम. कॉम के फर्स्ट इयर में टॉप करने की ख़ुशी में उसने अपने पापा से स्मार्टफोन तोहफे के रूप में आख़िरकार पा लिया।
नीरा की ख़ुशी का कोई परवान ना था।
मिन्टो में वाट्स एप और फेसबुक डाउनलोड कर ,अपनी सहेलियों और दोस्तों की तरह नीरा ने अपनी पहली "सेल्फी" पोस्ट की।
पोस्ट पर लाइक्स की भरमार ने नीरा को सेल्फी के नशे से सराबोर कर दिया।
वक़्त गुजरता गया और नीरा की सेल्फ़ियों का आंकड़ा एक दिन में 200 पार करने लगा।
पोस्ट ग्रेजुएशन के फाइनल इयर में सेकंड डिवीज़न लेकर, नीरा ने अपनी सहेलियों की कैरियर के प्रति सजगता को देखते हुए बड़े शहर में नौकरी करने का फैसला लिया।
सबकी उम्मीदों को संजोते हुए, मम्मी पापा और जबलपुर से विदा लेते हुए नीरा मुम्बई के "छत्रपति शिवजी टर्मिनस" पर ट्रेन से उतरी।
टर्मिनस के साथ सेल्फी लेते हुए , नीरा ने अच्छी नौकरी पाने का खुद से वादा किया और लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास डब्बे की टिकट लेकर नवी मुम्बई में स्थित घंसोलि इलाके में अपनी सीनियर के रूम पहुंची।
कुछ दिनों तक मुम्बई की स्काई स्क्रैपर कहलाने वाली गगनचुम्बी इमारतों के साथ नीरा की सेल्फ़ियों का सिलसिला फेसबुक पर लाइक्स की बाढ़ लाता रहा।
साथ ही साथ रोजाना 10 कंसल्टेंसीयों में जॉब के लिए इंटरव्यू देने का सिलसिला भी चलता रहा।
तकनिकी शिक्षा के ज़माने में सेकंड डिवीजन का एम कॉम और मुम्बई जैसे शहर में रहने का खर्चा, नीरा की जॉब के प्रति चिंता, जरूरतें और समस्याएं तीनो ही गंभीर रूप से खड़ी कर रहा था।
कभी सैड कभी हैप्पी मूड्स की सेल्फियां भी नियमित रूप से पोस्ट होती रहीं।
आखिरकार चार महीनो की कड़ी मेहनत के बाद नीरा को अँधेरी (वेस्ट) में स्थित एक मर्चंडीज़री कंपनी के टेली कालिंग विभाग के लिए , 27 तारिक को दुसरे इंटरव्यू राउंड को पार करते हुए , तीसरे और आखिरी इंटरव्यू राउंड में प्रवेश करने का मौका मिला। 
उस पद के लिए आये हुए सभी उमीदवारों में से नीरा और उसी के जैसी होनहार, महेनती और प्रभावशाली कैंडिडेट पल्लवी नायडू को फाइनल इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था।
अब कैंडिडेट 2 और पद एक ही था। नीरा को अपने ऊपर पूरा आत्मविश्वास था।
चैन की सांस लेते हुए नीरा ने लाइट मूड सेल्फी पोस्ट की ।
तीसरा और फाइनल राउंड नीरा की नौकरी के आयाम तय करने वाला था।
ऐरोली से वाशी स्टेशन पर लोकल ट्रेन बदलते हुए, नीरा को 29 तारिक की सुबह ठीक 11 बजे अँधेरी पहुंचना था।
29 तारिक की सुबह ,नीरा के मन में गहन चिंतन और असमंजसता से भरा उल्लास लेकर आ गयी।
समय सीमा को ध्यान में रखते हुए , और अपनी सबसे कीमती चीज़ "पूर्णतः चार्ज किया हुआ स्मार्टफोन" को संभालकर रखते हुए, नीरा,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐरोली स्टेशन से लोकल ट्रेन पकड़कर पूरे आत्मविश्वास के साथ वाशी स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक 2 पर पहुंची।
अगली लोकल का इंतज़ार करते हुए ,नीरा फेसबुक के लाइक्स चेक करने लगी।
इसी बीच , सामने ही प्लेटफार्म क्रमांक 4 पर चल रही एक सुप्रसिद्ध धारावाहिक की शूटिंग पर कलाकारों को देख नीरा का उत्साह अपने पूरे परवान पर आ गया।
सोशल मीडिया पर फेमस होने के इंटरनेट पर उपलब्ध तमाम नुस्खों में से एक "किसी सेलिब्रिटी के साथ सेल्फी" के नुस्खे ने नीरा के कदम अपने आप प्लेटफार्म क्रमांक 4 की ओर तेजी से बढ़ा दिए।
मेरी लोकल आने में अभी 10 मिनट का समय है, मैं झट से सेल्फी लेकर आ जाउंगी, कहते हुए नीरा अपने सबसे पसंदीदा कलाकार के पास पहुँच कर सेल्फी लेने में कामयाब हुई, और फौरन पोस्ट भी कर दिया।
वापस तेजी से लौटते वक़्त सबवे में दूसरी लोकल की भीड़ ने नीरा को अपनी लोकल पकड़ने से रोक दिया।
इसी बीच, कुछ ही मिन्टो में लाइक्स के सुनामी आ गयी, इस ख़ुशी की खुमारी में नीरा यह भूल गयी की अगली लोकल "धीमी गति कहलाने वाली लोकल थी" जो हर स्टेशन पर रुकते हुए जाएगी।
लाइक्स को देखते हुए लोकल का सफ़र ख़त्म हुआ और नीरा अपनी कंपनी पहुँचने में पूरे 45 मिनट लेट हो गयी।
टाइम बम की तरह चलते हुए घडी के कांटे ,नीरा की चिंता बढ़ा रहे थे, अंदर पहुँचने पर नीरा ने , पल्लवी नायडू को एक फॉर्म भरते हुए बैठे देखा।
नीरा ने यह सोचकर की इंटरव्यू अभी शुरू नहीं हुआ है, थोड़ी राहत की सांस ली और पल्लवी से पुछा कैसी हो ?, उसने उत्तर दिया सर ने तुम्हे अंदर बुलाया है।
कुछ देर बाद जब नीरा बाहर आई तोह उसकी पूरी मेहनत, उमीदें और सपने ,लाइक्स की सुनामी के साथ बह गए।
सुन्न पड़े हुए शरीर को लेकर नीरा एक कुर्सी पर बैठे हुए खिड़की के बाहर लोकल स्टेशन देख रही थी।
" फाइनल इंटरव्यू और कंपनी की टाइमिंग पालिसी की मर्यादा का लेट होते हुए अपमान करने के कारण वो जॉब पल्लवी को मिल चुकी थी "।
थोड़ी हिम्मत बांधकर वापस जाने के न लिए नीरा लोकल स्टेशन पहुंची, पानी पीने के लिए स्टेशन पर स्नैक्स कार्नर में कार्नर पे नीरा का फ़ोन बजा और उसमे "पल्लवी नायडू की अपने ऑफिस केबिन के साथ सेल्फी थी" ।
स्नैक्स कार्नर के रेडियो पर फ़िल्म बजरंगी भाईजान का प्रसिद्ध गाना "चले बेटा सेल्फी लेले रे" बज रहा था।
दुःख का दर्द इतना तीव्र था की नीरा अपने अश्रुओं को रोक न सकी।
ट्रेन में नीरा के दोस्तों के मेसेज आते रहे ,नीरा ! क्या हुआ तेरे इंटरव्यू?
तुझे जॉब मिल गयी न?
पूरे 2 घंटे हो गए ,तेरी सेल्फी नहीं आई अब तक?
बिना किसी मेसेज किये नीरा ने सेल्फी से मन ही मन हमेशा हमेशा के लिए विदा ली।
अगली सुबह ,खुद को ढांढस बांधते हुए नीरा अगली कंसल्टेंसी में अप्लाई करने निकल पड़ी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


## : - किसी भी वास्तु या क्रिया का जरुरत से ज्यादा इंसान से जुड़ाव सिर्फ और सिर्फ नुकसानदायक परिणाम लेकर आता है , फिर चाहे वो सेल्फी क्यों न हो !

The smart city; स्मार्ट सिटी की यात्रा



रमेश अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई ख़त्म कर चुका था।

किसी तड़के सुबह के अखबार की खबर ने रमेश को चोंका दिया।

छपा था "अब बार्सिलोना की तर्ज पर स्मार्ट बनेगा जबलपुर"।

रमेश असमंजसता से भरकर थोडा उत्साहित हुआ।

फिर मम्मीँ ने आवाज दी , रमेश "चाय पी ली हो तोह बाजार से सब्जी ले आ , जो भी तुझे पसंद हो । आज वही बनाउंगी तेरे लिए।
पापा बोले रमेश ला अखबार दे । पढ़ते पढ़ते बोले बेटा परवल लाना। 

माँ ने कहा रहने दो जी ,कुछ दिनों बाद मेरा बेटा बाहर पढ़ने चला जाएगा ,फिर कौन उसके खाने का ध्यान रखेगा। कम से कम अभी उसे अपने मनपसंद की सब्जियां खाने दो।
,,ठीक है मम्मी मैं आता हूँ।
अरे सुन ये कचरे की थैली भी लेते जा , जगह देखकर कहीं फेक देना।
रास्ते में पास के नुक्कड़ पर जमे कचरे के ढेर के पास कॉलोनी की शर्मा आंटी कचरा फेक रहीं थी।
वहीँ रमेश ने भी अपनी कचरे की थैली डाल दी।
आगे, थोड़ी दूर पर पहचान के बब्लू भैया , सड़क के किनारे लगे पेड़ के नीचे टॉयलेट कर रहे थे।
अरे ! रमेश और क्या हाल हैं। कहकर हाँथ मिलाने के लिए आगे बढे। रमेश ने नमस्ते कर लिया।
और रमेश कब जा रहा है पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए बाहर।
बस कुछ दिनों बाद भैया।

थोड़ी दूर और देर बाद सब्जी मार्किट में रमेश ने देखा , सब्जी के ठेलों के नीचे पिछली रात की बारिश से कीचड और गंदगी बजबजा रही है।
चारों ओर मवेशी सड़ी सब्जियों पर मौज उड़ा रहे हैं।
सब्जी को गौर से देखने पर उनके ताजेपन का इस कदर रमेश पर असर हुआ की उसने पनीर खरीदने की सोची और आगे बढ़ गया।

पनीर तोह नरेंद्र डेरी से ही लूंगा , दूर हुई तोह क्या हुआ पर ताजा तोह मिलेगा।
रमेश ने एक्टिवा का एक्सेलरेटर बढ़ा दिया।

थोड़ी दूर रेलवे फाटक बंद था। ट्रेन के इंतज़ार में रमेश गाडी बंद करके रेलवे की पटरी पर कुछ लोगों को सौच करते देख रहा था।
बायीं ओर कुछ अंकल लोग पिछली रात की बारिश से भरे हुए बड़े से गड्ढे में गिरी हुई आल्टो कार को देखकर चर्चा कर रहे थे
उन्होंने नगर निगम और प्रशासन की जमकर तारीफ़ की और ट्रेन आने के बाद । सिग्नल के उलटे शॉर्टकट रास्ते से निकल लिए।
वक़्त गुजरता हुआ , रमेश के जबलपुर से जाने का पैगाम एक दिन लेकर आया।
रमेश को आगे की पढाई के लिए , विदेश के विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया।
और उसे अब अपने पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए "बार्सिलोना" जाना था।

मुम्बई जाने वाली शाम की 7.30 वाली गरीबरथ मैं बैठे हुए रमेश ने मम्मी पापा से नम आँखों से विदा ली।
बार्सिलोना में पहला कदम रखते ही रमेश की आँखें खुली की खुली रह गयीं। वह अपने जीवन में "स्मार्ट सिटी" पहली बार देख रहा था।

एक रोज विश्वविद्यालय से लौटते वक़्त , रास्ते में रमेश ने नाश्ते के लिए एक बर्गर लिया और उसे ख़त्म करके वहीँ फेंक दिया।

कुछ स्थानीय लोग जो वहीँ खड़े थे उन्होंने रमेश को चेतावनी देते हुए दोबारा ऐसा न करने को कहा।
फिर किसी एक दिन आपा धापी में रमेश को वही गलती दोहराने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। 

जिसकी दास्तां रमेश का सूजा हुआ चेहरा पल पल उसे याद दिलाता रहा की उसे अपने अंदर के स्मार्ट व्यक्ति को छुपाते हुए, बार्सिलोना के रहन सहन अपनाने होंगे।

थोड़े तकलीफदेह थोड़े रोमांच से भरे और गुजरते हुए दिनों के साथ एक शाम , रमेश ने अपने रूम पार्टनर केरल के रहने वाले राजन से थोड़े दुखी अंदाज में एक सवाल किया।

राजन यार यहाँ के लोग इतने सख्त क्यों हैं, मेरी संस्कारधानी में लोगों में कितना प्रेम और कितनी सद्भबना है।
उत्तर में जो राजन ने कहा, उसने रमेश को बार्सिलोना के रहन सहन में ढलने में बहुत तेजी से मदद की, राजन ने कहा! रमेश मैं तुम्हारे सवाल का जवाब भी एक सवाल से देता हूँ,

ये बताओ ,जबलपुर में कहीं कचरा देखकर तुम्हे क्या लगता है, रमेश ने कहा कुछ नहीं ।
पर वही कचरा कोई तुम्हारे घर में फेंके तोह, मैं उसे मार मारकर कचरा बना दूंगा, रमेश ने कहा।

बस यही तोह जवाब है, यहाँ के लोग सख्त नहीं हैं, बस ये अपने शहर और देश से बहुत प्यार करते हैं, इसके हर एक नुक्कड़, सड़क और जगह को अपना घर समझते हैं। बस!
रमेश ,उसी दृष्टिकोण से रहते हुए बार्सिलोना में अपनी पढ़ाई करता रहा और, एक दिन रमेश के जाने का वक़्त आ गया।
रमेश को यूनाइटेड स्टेट्स के फिलाडेलफिया में नौकरी करने का और वहां ज्वाइन करने से पहले अपने "घर" जाने का अवसर मिला।

तीन साल की कड़ी मेहनत और बेहद लंबे अंतराल के बाद ,रमेश अपनी मिटटी अपने लोगों के बीच वापस आया।
जबलपुर स्टेशन का बोर्ड देखकर रमेश फूला नहीं समाया।

घर पर मम्मी के हाँथ की पनीर की सब्जी और पापा का मम्मी को परवल बनाने को कहने को देखकर ,रमेश ने 3 सालों बाद ख़ुशी की सांस ली।
अगली सुबह अपने साथ अखबार लायी, छपा था " कैलिफ़ोर्निया" की तर्ज पर समार्ट बनेगा जबलपुर"।
रमेश ने आक्रोशित हांथों से अखबार के उस आखिरी पन्ने को फाड़ दिया।
मम्मी की दी हुई कचरे की थैली लिए रमेश ,कॉलोनी के नुक्कड़ पर कचरे के ढेर के पास पहुंचा और देखा की समय के साथ साथ कॉलोनी के बच्चों की तरह ये कचरे का ढेर भी कितना बड़ा हो गया है, 

सोचते हुए थोड़ी दूर पर ही लगे नगर निगम के डस्टबिन में रमेश ने कचरा डाला और लौटते हुए देखा की कॉलोनी की शर्मा आंटी वहीँ कचरा फेंक रहीं हैं।

सब देखते हुए रमेश ने भरी हुई आँखों से खुद से एक सवाल किया , 

की क्या ऐसा हो सकता है की मेरे शहर के लोग कुछ समय बार्सिलोना हो आएं???????
फिर वही नरेंद्र डेरी जाते वक़्त ,"जबलपुर के बोर्ड ने इस बार रमेश से कहा।

मैं तुमसे हूँ ,, और तुम मुझसे।
जब तुम स्मार्ट बनोगे तभी मैं!!!!!!!!!!!!!!!! तुम नहीं तोह मैं भी नहीं ,और अगर मैं नहीं तोह तुम नहीं।


##:- जिस तरह ईटों से सिर्फ माकन बनता है , घर नहीं ! उसी तरह स्मार्ट सोच के लोगों के अभाव में शहर सिर्फ शहर रहता है , कोई स्मार्ट सिटी नहीं