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Sunday, August 14, 2016

Udaan, उड़ान (स्वतंत्रता दिवस विशिष्ट), independence day special


दिसंबर की सर्दियों में बादलों को चीरता ,चमचमाता और चिढ़ाता हुआ फाइटर जेट "HAL तेजस" किसी सितारे की तरह अटखेलियां करता हुआ बेस की ओर लैंडिंग करने आ रहा था।
तेलंगाना के हकिमपेट में स्थित एयरफोर्स बेस क्रमांक २ पर तेजस की लैंडिंग हुई।
जेट से पायलट के रूप में , चेहरे पर सूर्य सी चमक, कद काठी पर शौर्य का तेज, आत्मविश्वास से परिपूर्ण, बगल में हेलमेट और आखों पर कला एविएटर चश्मा लगाये ट्रेनी अरुणिमा शर्मा बेस की ओर आगे बढ़ रही थी। यूँ प्रतीत ही रहा था मानो आकाश से स्वयं माँ दुर्गा अवतरित होते हुए जमीं को पदस्पर्श कर रहीं हों।
अरुणिमा के नाम के आगे कैडेट लगने में कुछ ही समय बाकी था, तेजस की बतौर pilatus phase ii की ट्रेनिंग के रूप में यह उसका आखिरी परिक्षण था।
लाखों नौजवानों की तरह देश की सेवा में शामिल होने वाली, अरुणिमा वो पहली "लड़की" थी जिसे आई.ए. एफ मैं बतौर फ्लाइंग कैडेट बनने का गौरव हासिल होने वाला था।
और अगली सुबह का सूरज, आरुणिमा की ज़िन्दगी में सबसे कीमती दिन लेकर आया, समहवन्न अतिश्योक्ति दिवस, के उप्लक्ष पर बेस के सभागृह में आई.ए. एफ चीफ "विक्रम राहा", ऑफिसर्स, ट्रेनीस, कैडेट्स और अपने बच्चों के कंधे पर सितारे लगाने का सौभाग्य लिए समस्त माता पिता एवं अभिभावक उपस्थित थे। चीफ द्वारा प्रदान किये स्टार्स को हांथों में लिए अरुणिमा अपने पिता आर.के. शर्मा की ओर आगे बढ़ी। बेटी के कंधे पर स्टार्स लगाते वक़्त शर्मा साब की आँखें गर्व से भर आयीं। सबसे मिलते वक़्त अरुणिमा की नजर कैप्टन राघवेंद्र पर पड़ी जो अपनी माँ के चरण स्पर्श कर रहे थे, अरुणिमा उन्हें स्तब्द आँखों से टकटकी लागए देखती रही। पिताजी के आवाज देने पर किसी गहरे चिंतन में दूर तक डूबी अरुणिमा वापस आयी और पिताजी को अपने प्लेन की जानकारी हेतु ले गयी।
अपनी जॉइनिंग से पहले, अरुणिमा को फ़ोर्स से घर जाने की कुछ दिनों की अनुमति मिली। घर पहुँचते ही अरुणिमा ने अपने ट्रेनिग में जीते मैडल औए कंधे पर लगे सितारों को अपनी स्वर्गवासी माँ की तस्वीर के सामने अर्पित किए और उन्हें प्रणाम किया।
अगली सुबह, घर के रख रखाव का जायजा लेने के बाद अरुणिमा अपने पिता के साथ उनके द्वारा पिछले 40 वर्षो से संचलित अनाथालय "आकांशा" के लिए निकल पड़ी।
रास्ते में लंबे ट्रैफिक जाम में फँसी, दाहिने हाँथ पर चल रही कंस्ट्रक्शन साईट के पास लेटी और रोती हुई बच्ची को देख रही थी जिसकी माँ साईट पर ईंट उठा रही थी। बच्ची को देखने में अरुणिमा इतनी मशगूल हो गयी थी की जाम खुलने के बाद पीछे की कारों के हॉर्न उसे सुनाई ह नहीं दे रहे थे, फिर पिताजी के झकझोरने पर उसने एक्सीलेटर पर पांव पड़ा।
आकांशा पहुँचते ही, गेट पर ,शर्मा साब की तरह 40 वर्षों से आकांशा की सेवा कर रहे रघु काका ने अरुणिमा का जोरदार स्वागत किया। रघु काका के चरणस्पर्श कर अरुणिमा, आकांशा में फल फूल रहे तकरीबन सवा सौ बच्चों से मिली।
दीदी को देख सभी बच्चों का उत्साह परवान पर था। हर एक को तोहफा देने और सभी को जीवन में कुछ हासिल करने की प्रेरणा देने के बाद ,अरुणिमा वापस घर लौट आई।
65 वर्षीय और डायबिटीज के मरीज , शर्मा साब की धर्मपत्नी वसुंधरा के जाने के बाद अरुणिमा ने ही उनका पूरा ख्याल रखा था। लेकिन अरुणिमा के फ़ोर्स में जाने के बाद शर्मा साब अपनी दवाइयों के प्रति लापरवाह रहते। जिसका पूरा हिसाब उनकी HBA1c की रिपोर्ट अरुणिमा देख रही थी। रिपोर्ट के अनुसार ,जब शर्मा साब को लेकर अरुणिमा उनके पुराने डॉक्टर के यहाँ पहुंची तोह सारे जांच परिक्षण के बाद डॉक्टर के ओपिनियंस ने अरुणिमा को बराबरी से हैरत और दुखी कर दिया, किडनी पर जबरदस्त डायबिटीज के प्रहार से उन्हें डायलिसिस पर रहना था।
सारे इंतजामात करने के बाद और शर्मा साब से दवाइयों के प्रति सतर्कता बरतने का वादा लिए, अरुणिमा, फ़ोर्स से आये आर्डर के अनुसार वापस बेस लौट गयी।
जहाँ एक तरफ अरुणिमा अपनी जॉइनिंग के उपरांत पहले टास्क पर पूरी मेहनत कर रही थी। वहीँ शर्मा साब की हालत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही थी। अरुणिमा का अपने लक्ष्य के प्रति कोई खलल पैदा न हो इसलिए हार बार फ़ोन पर शर्मा साब अरुणिमा को सब खैरियत का झूठा दिलासा देते रहे और रघु को भी वास्तविकता बताने से मना किया था।
आखिरकार शर्मा साब की बेहद गम्भिर हालत ने रघु को अरुणिमा को बुलाने पर मजबूर कर दिया। अपनी मिशन को बीच में ही जब अरुणिमा जब तक अस्पताल पहुंची तब तक शर्मा जी दुनिया से विदा ले चुके थे।
बेटे जैसे बेटी पिताजी का अंतिम संस्कार कर घर पहुंची और माँ की फ़ोटो के बगल में पिताजी की तस्वीर लगाते वक़्त चट्टानी हौसले और वज्र का जिगर रखने वाली अरुणिमा मोम की तरह पिघलते हुए रोने लगी। रोते रोते अरुणिमा के मुख से एक ही बात निकल रही ,
की आज मैं फिर से"अनाथ" हो गयी।
उसे देख पास खड़े रघु काका की आँखें झुकी हुई थीं।
शर्मा साब को दी हुई कसम उनके जाने के साथ ख़त्म हुई, इस बात का ख्याल करते हुए, अरुणिमा ने रघु काका से सालों से मन में दबा हुआ प्रश्न पुछा, की "मैं अनाथालय कैसे पहुंची????????
रघु काका , अरुणिमा की कसक को बर्दाश्त न कर सके और शर्मा साब से माफ़ी मांगते हुए, अरुणिमा को बताया की ,,,,आज से तकरीबन 15 साल पहले निसंतान शर्मा साब और वसुंधरा भाभी तुम्हे आकांशा से घर ले गए थे।
अरुणिमा अचानक बोल पड़ी, यह तोह मैं जानती हूँ, मुझे इतना बता दीजिये मैं उन्हें कहाँ और कैसे मिली???
रघु काका ने बताया की , आकांशा से कुछ 3 किलोमीटर की दूरी पर जो नेशनल हाईवे है, उसी के पास से एक शाम साब अनाथालय का सामान लेकर लौट रहे थे, गाडी ख़राब होने की वजह से मैकेनिक को फ़ोन करने के बाद इंतज़ार कर रहे थे, इतने में पास सटी झाड़ियों से तुम्हारी आवाज सुन तुम्हारे पास पहुंचे और ,,,,,,,,तुम्हे आकांशा ले आये।
कुछ सालों बाद, तुम्हारी सेना की प्रति जिज्ञासा देख , साब और भाभी तुम्हे घर ले गए, तुम्हारा जूनून और साब की देख रख ,तुम्हारे कंधो पर लगे सितारे बयां करते हैं।
अरुणिमा बिटिया, मैं साब की सौगंध खाकर कहता हैं, बस इतना ही जनता हूँ, की उन झाड़ियों में तुम्हे कोई छोड़ गया था।
अगली सुबह रघु काका के चरण स्पर्श कर अरुणिमा , बेस के लिए रवाना हो गयी, माता पिता से भी बढ़कर शर्मा साब और माँ वसुंधरा की तस्वीर जहन में बसाये अरुणिमा , ने सौगन्ध ली की अपनी आगे की ज़िन्दगी की हर सांस वो नारी शक्ति के उत्थान में लगा देगीI
विकास पाण्डेय (१४/८/१६, १०.५४)

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