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Wednesday, August 31, 2016

प्रैक्टिकल; practical


सन् 2009

"3 इडियट्स" , भोपाल की राज टॉकीज़ में देखकर , "बी. फार्मा" के पांचवे सेमेस्टर का छात्र "सत्या" बाहर निकला। कॉलेज की क्लासों और लैबों में प्रॅक्टिकल्स के दौरान शिक्षकों और संभंधित विषयों का असर भले ही सत्या पर भित्ते भर न हुआ था, पर फ़िल्म में "आमिर" के किरदार और फ़िल्म का "मेसेज" सत्या की रगों में उतरने जा रहा था।

फ़िल्म में दिए गए मेसेज "की मनपसंद और स्वनिशीथता देने वाली क्रिया को जज्बे का रूप देते हुए कैरियर बनाये", के चिंतन में डूबा सत्या "छिंदवाड़ा" से भोपाल न सिर्फ डिग्री बल्कि अपने पूरे परिवार का सपना पूरा करने आया था।

मध्यमवर्गीय सत्या के परिवार के मुखिया "पिताजी" की सारी उम्मीदें सत्या पर इसलिए पुरजोर थीं, क्योंकि उन्हें यह पूरा विश्वास था की सत्या जल्द ही डिग्री ख़त्म करके , किसी अच्छी नौकरी हासिल कर परिवार में अपनी दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी उठाने में उनकी मदद करेगा।

सत्या के बचपन का मित्र और वर्तमान बैचमेट अरविन्द उसे फ़ोन पर कॉलेज की समस्त गतिवान गतिविधियों से अवगत कराते हुए यह बताता है की वर्तमान सेमेस्टर तेजी से अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, जिसमे की सत्या की अब तक की शून्य प्रतिशत उपस्थिति की वजह से शायद उसे परीक्षा फॉर्म भरने नहीं दिया जाएगा। अतः उसका सभी क्लासेज और प्रॅक्टिकल्स में उपस्थित होना बेहद अनिवार्य हो गया है।
अरविन्द की सूचना और पिताजी के आक्रोशित चेहरे की छवि उकेरे सत्या अगली ही सुबह , अपने विचार, मंथन और कल्पनाओ को बैग में लादते हुए कॉलेज पहुँचता है।

लैब में पहुँचते ही , सत्या की पिछले सेमेस्टरों की उपस्थिति एवं बेहतरीन प्रदर्शन की तुलना में वर्तमान सेमेस्टर में आये अचानक जबरदस्त गिरावट को ध्यान में रखते हुए सत्या के सभी सहपाठी और सेमेस्टर के फार्मसूटिक्स के शिक्षक सत्या को स्तब्ध निगाहों से देखते हैं।

कुछ देर की समझाइश के बाद प्रैक्टिकल शुरू होते ही, सत्या के कानों में प्रैक्टिकल सम्बंधित प्रश्न पड़ता है , की "पेरासिटामोल" ड्रग (दवा) की "सोल्युबिलिटी" (घुलनशीलता) निकाल कर लाओ?।

फिल्मों की खुमारी सत्या पर इस कदर छाई रहती की शिक्षक द्वारा पुछा गया प्रश्न उसे फ़िल्म "कोई मिल गया" के एलियन द्वारा भेजे गए कोडवर्ड सा प्रतीत होता।
और फलस्वरूप ड्रग की सोल्युबिलिटी वह तब निकाल पाता जब उसे सोल्युबिलिटी शब्द का मतलब मालूम होता।
कुछ ही देर में , लैब से बाहर निकाले जाने पर सत्या वापस अपने चिंतन में डूब जाता ।

जहाँ एक तरफ लैबों और क्लासों से बाहर निकाले जाने का सिलसिला सत्या पर गहरा असर डाल रहा था वहीँ दूसरी ओर फिल्मों की काल्पनिक दुनिया की तरफ सत्या का रुझान बढ़ता ही जा रहा था।

3 इडियट्स के मेसेज को ठीक से समझने के लिए सत्या बार बार वह फ़िल्म देखता, भोपाल में रूम और मेस के खर्चों के साथ साथ टिकटों का बोझ घर से पिताजी द्वारा भेजे हुए सीमित पैसों पर भारी पड़ता जोकि सत्या को अपनी कोर्स की कुछ महत्वपूर्ण किताबों को बेचने तक मजबूर कर देता।

जब जब अरविन्द सत्या से परीक्षाओं में आने वाले विषय संबंधी प्रश्न पूछता, तब तब सत्या फ़िल्म के मैसेज को दोहराते हुए खुद से सवाल जवाब करता, "की मैं वहीँ करूँगा जो मुझे अच्छा लगता है, मुझे ख़ुशी देता है, आखिर वह है क्या??

सवालों के समुद्र में गोते लगाते हुए सत्या कई सवाल खुद से करता जैसे :-
1. मुझे फ़िल्म देखना बहुत पसंद है, पर फ़िल्म देख देखके कैरियर बन सकता है क्या, नहीं नहीं !!
2. मुझे सोना बहुत पसंद , पर सोके कैरियर , नहीं!!
3. क्रिकेट बहुत पसंद है, पर विक्रम भैया 10 सालों से संघर्ष कर रहे हैं , नहीं इसमें भी मजा नहीं!!
गेम खेलना, दोस्त बनाना वगेरह जैसे अन्यागिनत सवालों की कड़ी अचानक तब टूटी , जब उसे ख्याल आया की मुझे सुपरबाइक्स चलाना बहुत पसंद है , और आजकल बाइक मॉडिफिकेशन का चलन भी जोरों पर है । इस क्षेत्र में मैं जरूर कुछ कर सकता हूँ , और इस कुछ का जवाब खोजने की लालसा ने सत्या के दिलो दिमाग में तूफ़ान पैदा कर दिया।

बस अपने इस जुनून और अरविन्द की पैशन प्लस (जिसमे 20 का पेट्रोल डला था) की थाकी चाबी लेते हुए और 3 इडियट्स का सुप्रसिद्ध गाना
"सारी उम्र हम मर मर के जी लिए"
रस्ते भर गाते हुए सत्या पुराने भोपाल में मोती मस्जिद के पास स्थित वसीम भाईजान के "रेंजर गेराज" में काम सीखने पहुँच गया।

वसीम भाई के बाइक मॉडिफिकेशन के चट्टानी तजुर्बे के सामने "हार्ले डेविडसन" के चीफ ऑटोमोबाइल engineers भी फेल थे।

सत्या से रूबरू मुखातिब और उसके हुलिये को टटोलते हुए भाईजान हिदायत दी की जिन हाथों में कॉपी और किताब होनी चाहिए ,उनमे पाना और पिंचिस शोभा नहीं देंगे, अतः वो वापस चला जाए।

लेकिन सत्या कहाँ मानने वाला था, और कई दिनों की मशक्कत और सत्या की जिद के सामने आख़िरकार भाईजान को मजबूर होकर उसे 2000 रु मासिक का काम देना पड़ा।

अपनी गति से गतिवान समय आगे बढ़ता रहा, एक तरफ लैबों में बीकरों की खन ख़न होती रही और दूसरी तरफ नटों और बोल्डरों की टन टन चलती रही। पाँचवे सेमेस्टर तक की जमा फीस, नाम के आगे डिग्री, और पिताजी का भय सत्या को मजबूरन कॉलेज खींच खींच कर लाता रहा ।

दैनिक दिनचर्या में सुबह के 10 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक कॉलेज और 6 बजे से लेकर रात के 11.30 बजे तक गेराज का काम सत्या की सेहत पर धीमा जहर घोलना शुरू कर रहा था।

तेज पर दिशाहीन बुद्धि के चलते , कभी ग्रेस, कभी सैम बैक और कभी सब्जेक्ट बैक जैसे परिणामों के साथ सत्या जैसे तैसे आठवें सेमेस्टर तक पहुँच गया।

तकरीबन 13 महीनो तक गेराज में कड़ी मशक्कत करने के बाद कोई सफलता न मिलने पर, और स्वास्थ्य पर गम्भीर असर होने की वजह से सत्या को काम छोड़ना पड़ा।

सन् 2012
आख़िरकार वो दिन आया जिसका हर छात्र को इंतज़ार रहता है, जिंदगी की पहली डिग्री का हाथों में होंना। सभी सहपाठियों की तरह अरविन्द ने भी अपने लिये भविष्य की तैयारियां रखी थीं। उसने अपने मित्र सत्या को बताया की प्रधान मंत्री छात्रवृति योजना के तहत उसने छंदबद्ध परीक्षा पास कर ली है और अब आगे की पढ़ाई के लिए वह "बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय" जा रहा है। अपने मित्र जिसने अभी तक सत्या का हर कदम साथ दिया , से बिछड़ते हुए सत्या के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट रहा था।

13 महीनो का गेराज का अपशिष्ट अनुभव
पिताजी की प्रकोपि उम्मीदें
और
बी.फार्मा की डिग्री के मूलतत्व ज्ञान का सिद्धहस्त अभाव। सत्या को न ही सिर्फ आगे पढ़ने के लिए रोक रहा था बल्कि किसी रोजगार को तलाशने के लिए बलपूर्वक विवश भी कर रहा था।

सेकंड डिवीजन की डिग्री हांथों में लिए सत्या फार्मा के हर क्षेत्र में नौकरी के लिए प्रयास करता है। मार्केटिंग, प्रोडक्शन वगेरह मैं कार्यरत सीनियर्स की सिफारिशें भी नाकाम रहती।

आख़िरकार थक हारकर , सत्या अपने दूर मौसाजी जो की भोपाल में ",अखिल भारतीय तकनिकी शिक्षा संस्थान" में सीनियर सुपरिन्टेंडेंट के पद पर कार्यरत थे के घर अपनी उम्मीदों के साथ पहुँचता है।

सत्या की तीक्ष्ण जिज्ञासा और भावनाओ को देखते हुए वे अपने करीबी मित्र "अशोक" जो की मंडीदीप स्थित "लुपिन फार्मास्युटिकल्स" में बतौर "क्वालिटी कण्ट्रोल मैनेजर के रूप में कार्य कर रहे थे, को फ़ोन करके सत्या की जॉइनिंग के प्रबंध का आग्रह करते हैं।

औपचारिक इंटरव्यू में बेहद ख़राब प्रदर्शन के बावजूद अशोक सत्या की जॉइनिंग क्वालिटी कण्ट्रोल विभाग में ट्रेनी के रूप में सत्या के मौसाजी को यह संकेत देते हुए करवाते हैं की अब यहाँ से सत्या की मेहनत और उसका प्रदर्शन ही उसे आगे ले जा सकेगा। अगर सत्या अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका तोह कंपनी की पॉलिसीस को मद्देनज़र रखते हुए वह भी कुछ नहीं कर सकेंगे।

कंपनी के विभिन्न विभागों में एक महीने के इंडक्शन प्रोग्राम के उपरांत , सत्या qc विभाग में अपने पहले दिन की शुरुआत करता है। और पहले ही दिन qc विभाग के सीनियर एनालिस्ट "प्रदीप" संजोगवष सत्या को वही सवाल जड़ देते हैं , जो उससे 2 साल पहले फार्मसूटिक्स के शिक्षक ने कॉलेज की लैब में पूछा था।

मिस्टर सत्या अपनी कंपनी में बनने वाली (methergine)टेबलेट्स का बैच तैयार हो रहा है, इसकी क्वालिटी को सुनिश्ति करने के लिये रैंडमली चुने गए सैंपल्स के परिक्षण हेतु पैरामीटर्स जैसे सोल्युबिलिटी , वेट वेरिएशन ड्रग प्रोफाइल वगरैह रिपोर्ट्स निकालकर मुझे आज दोपहर 2.00 बजे तक जमा कीजिये। ,,,,,,,

हुआ वही जिसका सवाल सुनते ही सत्या को डर था। दोपहर से रात के 2.00 बज गए पर रिपोर्ट का कोई अता पता न चला I

बीतते समय के साथ, सत्या की अन्यागिनत गलतियों और लापरवाहियों को प्रदीप की कम्प्लेंट्स हवा देती रहीं, जांच परिक्षण हेतु इंस्ट्रूमेंट्स से लदे क्वालिटी कंट्रोल के चैम्बर में सत्या की 9 घंटे की एक एक शिफ्ट एक एक साल की तरह बीत रही थी ।
सौंपा गया हर एक कार्य , सत्या का जीना दूभर कर रहा था।

आख़िरकार पहाड़ जैसा महीना बीतने के बाद , अशोक ,सत्या के मौसाजी को इत्तला करते हुए ,सत्या को मजबूरन उसका टर्मिनेशन लैटर हांथों में थमा देते हैं ।

पिछले 2 सालों में बीते वक़्त का फ्लैशबैक याद करते हुए दुखी सत्या , रूम पहुंचता ही है की , फ़ोन की घंटी पर बनारस से अरविन्द सत्या को याद करता है। बहते हुए अश्रुओं के साथ सत्या अरविन्द को कंपनी में बीते अनुभवों को बताते हुए ,यह कहता है की.......

अध्ययनकाल के दौरान पनपते बारूदी कैरियर को उसने खुद ही अपनी फ़िज़ूल की महत्वकांषाओं की चिंगारी से जलाकर राख कर दिया है।

3 इडियट्स तोह सन् 2009 में आई थी , पर उसके मैसेज को तोह उसने सन् 2007 में अपना पसंदीदा पाठ्यक्रम "बी.फार्मा" चुनकर कार्यान्वित किया था।

माता पिता को फ़ोन और घर पर और कॉलेज के शिक्षकों को लैबों और क्लासों में प्रॅक्टिकल्स/क्लासेज के दौरान , सत्या अपने झूठ और छलावे की अठखेलियां दिखाकर स्वैर कल्पनाओं की सवारी तोह करता रहा।

पर असल ज़िन्दगी के महज एक प्रैक्टिकल ने उसकी सोच और आत्मा को झकझोर कर रख दिया।

क्वालिटी कंट्रोल विषय संभंधित की जी तोड़ पढ़ाई कर, सत्या , वापस कंपनी में नौकरी पाने की सौगंध लेता है।


विकास पाण्डेय (३१/०८/२०१६)

Saturday, August 20, 2016

पहचान (हास्यमेव जयते) : pehchaan (hasyamev jayte)


'काय बड्डे', की गूँज से सराबोर बड्डापुर जिले का बडवानी इलाका पौ फटने से लेकर रात होने तक बड्डामय रहता।
सावन के आखिरी सोमवार की तड़के सुबह , रग रग में बहने वाले और हमेशा बहार आने को आतुर अपने "तकिये कलाम" को लिए बड्डों के बड्डे ,,,"बड्डन भैया" की तेजस्वी आँखें बडवानी में खुल पड़ीं।
विशालकाय कालिभुजंग कद काठी वाले बड्डन भैया, दातून फसाए और रस्ते में अन्यागिनत बार बड्डा जयराम करते हुए घोंघा नदी के ज्वाला तट पर स्नान हेतु पहुँचते ही मन ही मन नदी को अपना तकिया कलाम सुनाते हुए कूद पड़े।
स्नानोपरांत, उँगलियों में आधा दर्जन अंगूठियां और गले में सोने की सांकल (जिसकी किशतें बड्डन भैया को सताती रहती) पहने बड्डन भैया माथे पर भगवा तिलक और सफ़ेद कमीज पर भगवा गमछा (जिसे गूगल मैप में सॅटॅलाइट व्यू से भी देखा जा सकता था) डालकर बडवानी में स्थित सुप्रसिद्ध होटल "एक नं भैया" पोहा-जलेबी खाने पहुंचे।
""""इससे पहले की तकिया कलाम मुख से बहार आता, होटल के नौकर पुत्तन ने 5 प्लेट पोहा और आधा किलो जलेबी बड्डन भैया के सामने रख उन्हें शांत किया।
नाश्ता कर बड्डन भैया , अपनी बुलेट गाड़ी जिसके कलपुर्जों की सुनहरे रंग से कोटिंग की गयी थी पर सवार , जंभूरि चौक स्थित अपनी दूकान के लिए निकले,
रास्ते में "रावण कार ड्राइविंग स्कूल" की "ठोक्दो k10" में ड्राइविंग सीख रही मिसिज़ कालापानी से धोखे से बड्डन भैया की बुलेट छु गयी,
और बस आख़िरकार सुबह से अंदर ही अंदर कुलबुलाता बड्डन भैया का तकिया कलाम हुंकार भरता, आसमान में गर्जना करता हुआ , किसी एसिड की बारिश की तरह दोनों पर बरस पड़ा,,,,,,,,,
"""""ए ए ए एई ई ई ......."तुम लोग जानते नहीं मैं कौन हूँ"।
गर्जना से मिसिज़ कालापानी के कान इस कदर सुन्न पड़ गए थे मानो किसी ने कान में रस्सी बम फोड़ दिया हो।
बगल में बैठा ड्राइविंग स्कूल का ट्रेनर "घंटियाल" बड्डन को जनता तोह नहीं तोह नहीं था पर उनके ड्रेस कोड से किसी पार्टी से संभंधित होने का अनुमान लगाते हुए , बड्डन भैया से माफ़ी मांगने लगा। उसकी बिनती को देखते हुए जटा रुपी मूछों को फेरते हुए बड्डन ने मांफ किया और दुकान के लिए आगे बढे।

जंभूरि चौक स्थित बड्डन की दुकान पर उनका DJ और भंडारा आयोजन का व्यवसाय था। दुकान पहुंचने तक रास्ते भर कई मर्तबा तकिया कलाम बाहर आने को आतुर रहा लेकिन, सावन सोमवार की समाप्ति पर कावड़ियों के सैलाब के लिए और नागरिक भ्रष्टाचार मंत्री "श्री बाबू कतरी" के नगर आगमन के दौरान भंडारे और DJ की व्यवस्था के तनाव की वजह से वे खुद पर काबू किये रहे।
कुछ ही घंटों बाद ,विशाल कावंड यात्रा के कावड़िये जंभूरि चौक पहुंचे , उनकी संख्या इतनी प्रबल थी मानो, स्वयं घोंघा नदी सड़क पर उतर आयीं हो। बड्डन भैया और उनके सवा तीन दर्जन चेलों की पुरजोर तैयारी में पसंदीदा गाना "भोले तोह हो गए टनाटन" सुनते हुए और स्वल्पाहार करते हुए कावड़िये आगे अपने गंतव्य की और बढ़ लिए। बड्डन भैया का ख़ास चेला "जहर" ने बताया की कुछ लोग स्वल्पाहार की बुराई कर रहे थे , पर आपसे कुछ नहीं कहा, घमंडी हंसी का भाव लाते हुए और अपना तकिया कलाम जड़ते हुए बड्डन बोल पड़े "किसी की हिम्मत है" ???।
अचानक मोबाइल की रिंगटोन "भोला नई माने रे" बजी , और बड्डन को खबर आई की माँ की तबियत बहुत ख़राब लग रही है, शाम को मंत्री जी के आगमन की तैयारियां की चिंता सोचते हुए , बड्डन ने जहर को माँ को सुप्रसिद्ध व्यापम कांडी डॉक्टर "चूना वाला" को दिखाने के लिये भेजा और ये भी हिदायत दी की डॉक्टर को बता देना की यह "किसकी" माँ हैं।
मंत्रीजी के मंच साज सज्जा की तैयारियों में जुटे बड्डन के सामने सड़क पर, किसी फिदायीन रुपी गमछा लपेटे अपनी ए वी एस "चूंटी" पर आ रही लड़की को खाज "अल्सर" पर सवार लड़के ने टक्कर मर दी थी। लड़की को बचाने पास खड़े "स्पाइडरमैन, सुपरमैन, बैटमैन और आयरन मैन" लड़के को सबक सिखाने पहुँच चुके थे, पहले कौन बचाएगा की कोलाहल में सभी सुपर हिरोज आपस में "तू जानता नहीं मैं कौन हूँ", "तू नहीं जानता की मैं कौन हूँ" की गूँज से बाजा फाड़ रहे थे।
पास खड़े तमाशा देख रहे बड्डन के कानों में अचानक , खुदका सर्वाधिकार समझने वाले तकिया कलाम की गूँज पड़ी, जिसे सुनते ही बड्डन की रगों में बह रहे आरबीसी, w बीसी और प्लेटलेट्स में उबाल आ गया जिसके फलस्वरूप "हल्क" का रूप ले चुके बड्डन और उनके चेलों ने स्पाइडर और सुपर तोह क्या किसी को मैन कहलाने लायक भी नहीं छोड़ा।

.....शाम को मंत्रीजी को दूर से देखते ही बड्डन को फ्लैशबैक में याद आया की कैसे उन्होंने एक बार बीहड़ में पंचर हुई मंत्रीजी (जोकि पहले विधायक थे) की गाडी का पंचर बनाया था, जिस प्रतिभा को देख मंत्रीजी ने बड्डन को पार्टी के लड़कों से जुड़ने कहा था, और जिसके उपरांत बड्डापुर में लगे पार्टी प्रचार के बड़े बड़े हॉर्डिंग्स में मुख्य कार्यकर्ता जैसे "डोगा", "भोकाल" "पनियल" और न जाने कितनो के नीचे दबी हुई अपनी 2x2 की फ़ोटो देख बड्डन आज भी खुद को मन ही मन "विधायक" मानते हैं।
उधर जहर के फ़ोन पे फ़ोन बड्डन को अस्पताल की ओर खींच रहे, पर मंत्री जी से मिले बगैर बड्डन का वहां से निकलना संभव न था, आख़िरकार सभा समाप्ति के बाद और मंत्रीजी के बड्डन की ओर एक बार भी न देखने पर निराश बड्डन किसी धूमकेतु की गति से अस्पताल की और भागे।
रास्ते में बुलेट बंद होने की वजह से हलाकान बड्डन ,2 टन की बुलेट को घसीटते हुए, कहते रहे "चालू होजा, तू जानती नहीं मैं कौन हूँ" । थोड़ी दूर बुलेट सुधरवाने के बाद, बड्डन फिर गति पकड़ते ही हैं की अचानक सामने से आ रही महिंद्रा "बिलोरो"" से उनकी बुलेट की जबरदस्त भिड़ंत हो जाती है, बुलेट को तोह कुछ नहीं होता परंतु बिलोरो का बाँया हिस्सा पूर्णतः बिलुर जाता है, थोड़ी से चोट से और हलाकान बड्डन तकिया कलाम का बवंडर पैदा करते हुए , ड्राईवर की जोरदार पिटाई करते हुए बिलोरो को भी तहस नहस कर देते हैं। बिलोरो के अंदर बैठा दंपति बुरी तरह सहम जाता है।
खुद को शांति मिलने के बाद बड्डन आगे बढ़ते हुए, हॉस्पिटल के गेट पर पहुँचते ही हैं की पीछे से "डू नॉट डायल 100" से उतरे पोलिसकुकर्मि "पस्तराम" और "घूस गैंडाम" बड्डन की कालर पकड़ते हुए , गाडी में बिठाकर उन्हें थाने में लाकर बंद कर देते हैं।
तकिया कलाम का रट्टा लगाते हुए बड्डन थाना इंचार्ज "बेताल सिंह" को अपना परिचय देते हैं की वो " कुत्तर गधानसभा क्षेत्र" की "केला खाओ" पार्टी के मेधावी कार्यकर्ता हैं। यह सब सुनकर आक्रोशित बेताल सिंह , बड्डन की जोरदार मालिश करवा देते हैं। बड्डन अपना मोबाइल फ़ोन "मतरोला" निकालते हैं, लेकिन भिड़ंत के दौरान वो भी तहस नहस हो चुका रहता है।

पहचान
हस्यमेव जयते (अंतिम भाग)
,,,,,,पूरे 48 घंटो के बाद और किसी के छुड़वाने तोह दूर, मिलने भी न आने पर बड्डन की चिंताएं बढ़ जाती हैं। लाख माफियां मांगने के बाद भी बड्डन पर कोई रहम नहीं बरता जाता। अपने तकिया कलाम से मजबूर बड्डन उसे दोहराता रहता, पक चुके कानों से परेशांन पस्तराम बड्डन को बताता है की
"तू कौन है ये तोह मुझे नहीं मालूम , पर तू नहीं जानता की तूने किसकी गाड़ी क्षतिग्रस्त की है , सवालिया निशान लिए बड्डन पूछता है किसकी ? पस्तराम उसे बताता है की वो बड्डापुर के "कमिश्नर" श्री "प्रदीप खेडेकर" की गाडी थी। और तुझे अब ब्रम्हा भी नहीं बचा सकते । बड्डन की साँसे हलक में रुक जाती है।
आख़िरकार पाँचवे दिन पस्तराम लॉकर का दरवाजा खोलता है और बड्डन को बाहर आने कहता है , सीना ताने बड्डन तकिया कलाम जड़ता ही है की पस्तराम उसे बताता है की तुम्हे कोई छोड़ा वोडा नहीं जा रहा , तुम्हारी माँ का देहांत हो गया और 3 घंटे के लिए अंत्येष्टि के लिये ले जाया जा रहा है।
घाट पहुँचते ही माँ के पार्थिव और अग्नमग्न शारीर से उठती लपटें , बड्डन को पहली बार उसकी असली """""पहचान"""" बता रहीं थीं।
जिसे महसूस कर बड्डन को एहसास हुआ की "वह कौन है"।
विकास पाण्डेय (२०/०८/२०१६, ०३.२९)

Sunday, August 14, 2016

Udaan, उड़ान (स्वतंत्रता दिवस विशिष्ट), independence day special


दिसंबर की सर्दियों में बादलों को चीरता ,चमचमाता और चिढ़ाता हुआ फाइटर जेट "HAL तेजस" किसी सितारे की तरह अटखेलियां करता हुआ बेस की ओर लैंडिंग करने आ रहा था।
तेलंगाना के हकिमपेट में स्थित एयरफोर्स बेस क्रमांक २ पर तेजस की लैंडिंग हुई।
जेट से पायलट के रूप में , चेहरे पर सूर्य सी चमक, कद काठी पर शौर्य का तेज, आत्मविश्वास से परिपूर्ण, बगल में हेलमेट और आखों पर कला एविएटर चश्मा लगाये ट्रेनी अरुणिमा शर्मा बेस की ओर आगे बढ़ रही थी। यूँ प्रतीत ही रहा था मानो आकाश से स्वयं माँ दुर्गा अवतरित होते हुए जमीं को पदस्पर्श कर रहीं हों।
अरुणिमा के नाम के आगे कैडेट लगने में कुछ ही समय बाकी था, तेजस की बतौर pilatus phase ii की ट्रेनिंग के रूप में यह उसका आखिरी परिक्षण था।
लाखों नौजवानों की तरह देश की सेवा में शामिल होने वाली, अरुणिमा वो पहली "लड़की" थी जिसे आई.ए. एफ मैं बतौर फ्लाइंग कैडेट बनने का गौरव हासिल होने वाला था।
और अगली सुबह का सूरज, आरुणिमा की ज़िन्दगी में सबसे कीमती दिन लेकर आया, समहवन्न अतिश्योक्ति दिवस, के उप्लक्ष पर बेस के सभागृह में आई.ए. एफ चीफ "विक्रम राहा", ऑफिसर्स, ट्रेनीस, कैडेट्स और अपने बच्चों के कंधे पर सितारे लगाने का सौभाग्य लिए समस्त माता पिता एवं अभिभावक उपस्थित थे। चीफ द्वारा प्रदान किये स्टार्स को हांथों में लिए अरुणिमा अपने पिता आर.के. शर्मा की ओर आगे बढ़ी। बेटी के कंधे पर स्टार्स लगाते वक़्त शर्मा साब की आँखें गर्व से भर आयीं। सबसे मिलते वक़्त अरुणिमा की नजर कैप्टन राघवेंद्र पर पड़ी जो अपनी माँ के चरण स्पर्श कर रहे थे, अरुणिमा उन्हें स्तब्द आँखों से टकटकी लागए देखती रही। पिताजी के आवाज देने पर किसी गहरे चिंतन में दूर तक डूबी अरुणिमा वापस आयी और पिताजी को अपने प्लेन की जानकारी हेतु ले गयी।
अपनी जॉइनिंग से पहले, अरुणिमा को फ़ोर्स से घर जाने की कुछ दिनों की अनुमति मिली। घर पहुँचते ही अरुणिमा ने अपने ट्रेनिग में जीते मैडल औए कंधे पर लगे सितारों को अपनी स्वर्गवासी माँ की तस्वीर के सामने अर्पित किए और उन्हें प्रणाम किया।
अगली सुबह, घर के रख रखाव का जायजा लेने के बाद अरुणिमा अपने पिता के साथ उनके द्वारा पिछले 40 वर्षो से संचलित अनाथालय "आकांशा" के लिए निकल पड़ी।
रास्ते में लंबे ट्रैफिक जाम में फँसी, दाहिने हाँथ पर चल रही कंस्ट्रक्शन साईट के पास लेटी और रोती हुई बच्ची को देख रही थी जिसकी माँ साईट पर ईंट उठा रही थी। बच्ची को देखने में अरुणिमा इतनी मशगूल हो गयी थी की जाम खुलने के बाद पीछे की कारों के हॉर्न उसे सुनाई ह नहीं दे रहे थे, फिर पिताजी के झकझोरने पर उसने एक्सीलेटर पर पांव पड़ा।
आकांशा पहुँचते ही, गेट पर ,शर्मा साब की तरह 40 वर्षों से आकांशा की सेवा कर रहे रघु काका ने अरुणिमा का जोरदार स्वागत किया। रघु काका के चरणस्पर्श कर अरुणिमा, आकांशा में फल फूल रहे तकरीबन सवा सौ बच्चों से मिली।
दीदी को देख सभी बच्चों का उत्साह परवान पर था। हर एक को तोहफा देने और सभी को जीवन में कुछ हासिल करने की प्रेरणा देने के बाद ,अरुणिमा वापस घर लौट आई।
65 वर्षीय और डायबिटीज के मरीज , शर्मा साब की धर्मपत्नी वसुंधरा के जाने के बाद अरुणिमा ने ही उनका पूरा ख्याल रखा था। लेकिन अरुणिमा के फ़ोर्स में जाने के बाद शर्मा साब अपनी दवाइयों के प्रति लापरवाह रहते। जिसका पूरा हिसाब उनकी HBA1c की रिपोर्ट अरुणिमा देख रही थी। रिपोर्ट के अनुसार ,जब शर्मा साब को लेकर अरुणिमा उनके पुराने डॉक्टर के यहाँ पहुंची तोह सारे जांच परिक्षण के बाद डॉक्टर के ओपिनियंस ने अरुणिमा को बराबरी से हैरत और दुखी कर दिया, किडनी पर जबरदस्त डायबिटीज के प्रहार से उन्हें डायलिसिस पर रहना था।
सारे इंतजामात करने के बाद और शर्मा साब से दवाइयों के प्रति सतर्कता बरतने का वादा लिए, अरुणिमा, फ़ोर्स से आये आर्डर के अनुसार वापस बेस लौट गयी।
जहाँ एक तरफ अरुणिमा अपनी जॉइनिंग के उपरांत पहले टास्क पर पूरी मेहनत कर रही थी। वहीँ शर्मा साब की हालत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही थी। अरुणिमा का अपने लक्ष्य के प्रति कोई खलल पैदा न हो इसलिए हार बार फ़ोन पर शर्मा साब अरुणिमा को सब खैरियत का झूठा दिलासा देते रहे और रघु को भी वास्तविकता बताने से मना किया था।
आखिरकार शर्मा साब की बेहद गम्भिर हालत ने रघु को अरुणिमा को बुलाने पर मजबूर कर दिया। अपनी मिशन को बीच में ही जब अरुणिमा जब तक अस्पताल पहुंची तब तक शर्मा जी दुनिया से विदा ले चुके थे।
बेटे जैसे बेटी पिताजी का अंतिम संस्कार कर घर पहुंची और माँ की फ़ोटो के बगल में पिताजी की तस्वीर लगाते वक़्त चट्टानी हौसले और वज्र का जिगर रखने वाली अरुणिमा मोम की तरह पिघलते हुए रोने लगी। रोते रोते अरुणिमा के मुख से एक ही बात निकल रही ,
की आज मैं फिर से"अनाथ" हो गयी।
उसे देख पास खड़े रघु काका की आँखें झुकी हुई थीं।
शर्मा साब को दी हुई कसम उनके जाने के साथ ख़त्म हुई, इस बात का ख्याल करते हुए, अरुणिमा ने रघु काका से सालों से मन में दबा हुआ प्रश्न पुछा, की "मैं अनाथालय कैसे पहुंची????????
रघु काका , अरुणिमा की कसक को बर्दाश्त न कर सके और शर्मा साब से माफ़ी मांगते हुए, अरुणिमा को बताया की ,,,,आज से तकरीबन 15 साल पहले निसंतान शर्मा साब और वसुंधरा भाभी तुम्हे आकांशा से घर ले गए थे।
अरुणिमा अचानक बोल पड़ी, यह तोह मैं जानती हूँ, मुझे इतना बता दीजिये मैं उन्हें कहाँ और कैसे मिली???
रघु काका ने बताया की , आकांशा से कुछ 3 किलोमीटर की दूरी पर जो नेशनल हाईवे है, उसी के पास से एक शाम साब अनाथालय का सामान लेकर लौट रहे थे, गाडी ख़राब होने की वजह से मैकेनिक को फ़ोन करने के बाद इंतज़ार कर रहे थे, इतने में पास सटी झाड़ियों से तुम्हारी आवाज सुन तुम्हारे पास पहुंचे और ,,,,,,,,तुम्हे आकांशा ले आये।
कुछ सालों बाद, तुम्हारी सेना की प्रति जिज्ञासा देख , साब और भाभी तुम्हे घर ले गए, तुम्हारा जूनून और साब की देख रख ,तुम्हारे कंधो पर लगे सितारे बयां करते हैं।
अरुणिमा बिटिया, मैं साब की सौगंध खाकर कहता हैं, बस इतना ही जनता हूँ, की उन झाड़ियों में तुम्हे कोई छोड़ गया था।
अगली सुबह रघु काका के चरण स्पर्श कर अरुणिमा , बेस के लिए रवाना हो गयी, माता पिता से भी बढ़कर शर्मा साब और माँ वसुंधरा की तस्वीर जहन में बसाये अरुणिमा , ने सौगन्ध ली की अपनी आगे की ज़िन्दगी की हर सांस वो नारी शक्ति के उत्थान में लगा देगीI
विकास पाण्डेय (१४/८/१६, १०.५४)

Saturday, August 6, 2016

friendship day; फ्रेंडशिप डे


राघव, cbse स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाला एक बेहद, अत्यंत ,,,,,अंतर्मुखी छात्र था।
उसके अन्तर्मुखीपन की वजह , अच्छी मंशा से दी हुई बचपन की एक सीख को गलत ढंग से आत्मसात करना थी।
सीख थी" बुरे वक़्त में काम आने वाले ही अच्छे और सच्चे मित्र होते हैं",,,,,,,,बाकी सुनहरे वक़्त में तोह सब मौज उड़ाते है।
इस वाक्यांश ने राघव पर इतना गहरा असर किया था की वो हर मिलने वाले शक्श को स्वार्थ और मतलब के दृश्टिकोण से ही देखता था, हार बार वह सिर्फ और सिर्फ यह सुनिश्ति करने के गुंताड़े में रहता की कौन मेरे कितने काम आ रहा है।
उसकी इस सोच की कसौटी पर केवल दो ही लोग खरे उतरे थे, सिद्धार्थ और गरिमा, राघव के साथ बचपन से स्कूल में पढ़ने वाले, ये दोनों राघव की शुरू से ही मदद करते आ रहे थे, और सोच के मुताबिक राघव को चेक करने से फुरसत ही कहाँ थी की वो इनकी मदद करे।
फ्रेंडशिप डे का दिन था, हज़ारों की भीड़ से बने अपने मात्र दो दोस्तों के लिए राघव ने फ़्रेंडशिप बैंड खरीद लिए थे।
पहले, सिद्धार्थ और गरिमा मुझे विश करेंगे ,फिर मैं करूँगा, इस सोच के साथ राघव की सुबह से शाम हो गयी , हज़ारों बार मोबाइल चेक करने वाले राघव को वो दो मेसेज नहीं मिले जिसका उसे बेसब्री से इंतज़ार था।
हर एक पल पर सामने से मिलने वाले रिस्पांस को तौलने वाले राघव का ख़रीदे हुए फ्रेंडशिप बैंड्स को देख देख कर खून खौल रहा था।
गुस्से से तिलमिलाए राघव ने सिद्धार्थ और गरिमा को मन ही मन मतलबी और स्वार्थी घोषित करते हुए , दुश्मन जैसा मान लिया था।
शाम से रात होने को आई ,राघव के मोबाइल का इनबॉक् खाली का खाली ही रहा, फ़्रेंडशिप डे की समाप्ति को केवल 10 मिनट ही बाकी थे, राघव ने दोस्ती तोड़ने के उद्देश्य से सिद्धार्थ को फ़ोन किया, मोबाइल बंद मिला! घर पर कई घंटियों के बाद सिद्धार्थ के घर के नौकर ने फ़ोन उठाया और जो कुछ बताया उससे राघव की नींद और चैन सब उड़ गया।
कोचिंग से लौटते वक़्त , साइकिल पर सवार सिद्धार्थ को सामने से आती कार की जबरदस्त टक्कर से गंभीर चोटें आयीं थी , और वह हॉस्पिटल के icu में भर्ती था। नौकर ने ये भी बताया की,,,,,
सिद्धार्थ को देखने जा रही गरिमा को रास्ते में मिले फ़ोन में यह खबर मिली की उसकी मम्मी को हार्ट अटैक आ गया है, उलटे पावँ भागी गरिमा के पापा मम्मी को हॉस्पिटल ले जा रहे हैं, इत्तेफ़ाकन गरिमा की मम्मी भी उसी हॉस्पिटल में एडमिट थीं, जिसमे सिद्धार्थ भर्ती था।
पूरी रात खुद को कोसता हुआ राघव अगली सुबह का सूरज निकलते ही ,हॉस्पिटल को ओर भागा। कांच के बाहर से सिद्धार्थ को झांकते हुए राघव अपने न रुकने वाले आसुओं को पोंछ ने की कोशिश कर रहा था।
थोड़ी देर के लिए मिलने आई गरिमा भी सिद्धार्थ के पास ही बैठी थी।
बहुत हिम्मत करके राघव ,सिद्धार्थ के नजदीक पहुंचा उसका हाँथ पकड़कर और रोती हुई गरिमा को देखते हुए ,निशब्द राघव बस यही सोच रहा था की ,इनके बुरे वक़्त में इनके साथ न रहकर उसने अपनी दोस्ती का अपमान किया है।
कुछ देर बाद , गरिमा का ढांढस बंधाते हुए ,राघव ने अपनी जेब से फ़्रेंडशिप बैंड निकाला और दोनों को बांधते हुए , मन ही मन यह सौगंध ली की अब सारी जिंदगी वह दूसरों की मदद के रूप में सामने आएगा।
इस सौगंध के साथ राघव चुपचाप अपने घर लौट गया, अपने रूम में पहुंचते ही उसने अपनी डायरी जला दी जिसमे उसने स्वार्थ रुपी हुए कामों की व्याख्या की थी।
नई डॉयरी के उद्घाटन के रूप में उसने पहले पन्ने पर पहले शब्द लिखे,,,,जो थे,,,,,,"अ फ्रेंडशिप डे".

global war(n)ing; ग्लोबल वॉर(निं)ग


सन् 2020,
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के भनपुरी इलाके की सत्यम कॉलोनी में स्थित अपने घर में 65 वर्षीय रामानंद शर्माजी की जून माह की झुलसाने वाली गर्मी में रात में अचानक 2 बजे नींद टूट गयी।
पसीने से लत पथ शर्माजी गमछा उठाये इस आस में की बहार थोड़ी राहत मिलेगी, कॉलोनी के बीचों बीच स्थित भगवान शंकर के मंदिर के चबूतरे में जाकर बैठ गए।
यहाँ वहां नजर घुमाने पर देखा तोह कॉलोनी वासी एयर कंडीशनर की हवा बंद होने पर जल बिन मछली की तरह तड़पते हुए ,चीख पुकार कर रहे हैं। छोटे छोटे बच्चे जो ac में ही पैदा हुए थे, टमाटर की तरह लाल हो रहे हैं। अपने प्रभु से बिजली वापस लाने की प्रार्थना में शर्माजी लीन होने के प्रयास में भयंकर गर्मी की वजह स विफल रहे।
थोड़ी देर तक राहत न मिलने पर कॉलोनी के बाहर, बिलासपुर हाईवे से सटे फूटपाथ पर चलते हुए 1 किमी की दूरी पर शर्माजी बंजारी माता के मंदिर पहुंचे। सोचा यहां थोडा खुलापन है, यहाँ शायद पसीना बहना बंद हो!
,,,,,,,लेकिन जून माह की गर्मी और भनपुरी के समीप छत्तीसगढ़ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन के उरला इलाके में स्थित सैकड़ों स्टील की कंपनियों से निकलने वाली तपन की जुगलबंदी ने 90 किलो के शर्माजी के बदन से पसीने के नल चालू रखे।
आख़िरकार थक हारकर, कुम्भकर्णीय मुहूर्त्त में शर्माजी की अपने घर के बरामदे में जैसे तैसे आँख लगी।
कुछ ही देर में, सूर्यदेव घर के अंदर घुसते हुए और शर्माजी की बनियान खींचते हुए गुड मॉर्निंग करने पहुँच गए।
बंद आँखें लिए, नहा धोकर पूजा अर्चना करके ,शर्माजी पेपर पढ़ने बैठे ही थे, की घर के बाहर खड़े कॉलोनी के पुरुषवर्ग की आवाजें शर्माजी को बाहर खींच लायीं।
सोसाइटी के वरिष्ठ अध्यक्ष होने के नाते, पूरा जमघट और बिजली न आने का आक्रोश लेकर शर्माजी पास ही के इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के ऑफिस पहुंचे।
53 डिग्री के पारे ने कॉलोनीवासियों को पूरा राशन पानी लेकर बोर्ड के सब इंजीनियर पर चढ़ने पर मजबूर कर दिया।
बिजली ऑफिस की टीम द्वारा कॉलोनी के जर्जर पड़े ट्रांसफार्मर की मरम्मत करते ही ,कॉलोनी कूलर और ac के कंप्रेस्सरों की आवाज से गूँज उठी। यह मधुर आवाज सुनते ही राहत की अनुभूति हेतु सभी अपने गंतव्य की ओर बंदरों की तरह लपके।
कुछ देर उपरांत , शर्माजी को कैलाश मानसरोवर की यात्रा कराती कूलर की शीतल हवा अचानक रुक गयी!!
थोड़ी देर ही मैं क्रिकेट मैच के रीप्ले की तरह शर्माजी और सब इंजीनयर , सुबह की तरह फिर ट्रांसफार्मर को सुधारते हुए कर्मचारियों को तक रहे थे।
सुबह के आक्रोश का खेद जताते हुए, शर्माजी ने सब इंजीनियर को समझाने की कोशिश की ही थी की , चश्मा उतारकर आँखों में चुन चुनाते हुए पसीने को पोंछकर जब सब इंजीनियर ने तकनिकी समस्या के आंकड़े जैसे ही बताये, शर्माजी का ट्रांसफार्मर उड़ गया।
इंजीनियर ने बताया, आपकी कॉलोनी में कुल 84 घर हैं,
तीनसौ अस्सी टन की भार क्षमता वाला यह मासूम ट्रांसफॉर्मर आप लोगों का भार पिछले 35 सालों से उठा रहा है।
आज से महज 7 साल पहले ,जहाँ आपकी कॉलोनी में मात्र 11 ac लगे थे ,वही आज बढ़कर 77 हो गए हैं । इस लिहाज से जैसे ही पारा बढ़ते सब ac चालू करते हैं , इसकी सांस उखड जाती।
अब आप यह कहेंगे की एक ट्रांसफार्मर और लगवा दो, तोह यह देखिये उसके मेरे द्वारा दिए हुए आवेदन, पर आप लोगों ने ही नगर निगम से नक्शा पास करा करा कर ,जो मकान पे मकान धोंके हैं उसके बाद, कोई जगह ही कहाँ छोड़ी है दूसरे ट्रांसफॉर्मर लगने की !!!!!,
हर नया ac कॉलोनी में घुसते ही , इस बिचारे को शोषण की नजर से चिढ़ाता हुआ निकल जाता, और ये बेचारा दर के मारे उड़ जाता है।
~~~अब आप ही बताइये , दूसरा ट्रांसफार्मर कहाँ लगा दूं, !!!आपके सिर पर??????????.
निशब्द और स्तब्ध शर्माजी, विचारों के टोकरी अपने सर पर रखे चुपचाप अपने घर हो लिए, घर पर उनकी धर्मपत्नी कौशल्या चाय लाकर पास बैठीं।
और इतना ही कहा की आज अगर मेरे ,ब्रम्हा, विष्णु और महेश होते तोह यह समस्याएं कभी न आती।
एन्विरोमेंटल साइंस में पीएचडी , कौशल्या ने घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों को मद्देनजर रखते हुए 25 साल पहले अपनी नौकरी त्यागी थी। गृहस्थ जीवन में महारथ और काम में बेहद कुशल कौशल्या ने अपने ज़िन्दगी के तजुर्बे से शर्माजी के आँगन को अपनी मेहनत से संवारा था।
38 साल पहले ब्याह होकर आयीं और प्रकर्ति के प्रति असीम लगाव रखने वाली कौशल्या , सत्यम कॉलोनी के इर्द गिर्द लगे हजारों पेड़ पौधों को अपने बच्चों जैसा मानती और उनकी पूजा अर्चना करती आ रहीं थीं। उनमे से तीन वृक्ष कौशल्या और कॉलोनी की सभी महिलाओं के लिए वरदान रुपी प्रतीत होते, वे थे नीम , पीपल और बट। इन् तीनो का ही नाम कौशल्या ने ब्रम्हा, विष्णु और महेश रखा था।
वर्तमान में, बीतते समय के साथ बढ़ते पारे और बिजली की आंखमिचौली लोगों को हताहत करती रही, सितम्बर शुरू होने को आया और बारिश का नामोनिशान न था।
हलाकान गर्मी और बिजली की समस्या शर्माजी के दो पुत्रों, उनकी पत्नियां और नाती पोतों पर इस कदर प्रहार करती रही की घर का खुशहाल वातावरण भी खराब होने लगा था।
बारिश के लिए शर्माजी ने कॉलोनी में स्थित मंदिर में , भव्य यज्ञ का आयोजन कराया, दिन रात की प्रकांड पूजा पाठ के बावजूद गर्मी के तेवर कम न हुए।
21 दिनों के उपवास के बाद जब बारिश न आई तोह बदहाल शर्माजी भगवान शंकर के चरणों में गिरकर दया की भीख मांगने लगे। बोलने लगे, कहाँ हो प्रभु ? प्रकट हो, रहम करो!
इतने मे शर्माजी के कानो में पड़ती हुई एक दिव्या आवाज ने कहा,,"मैं यहीं था ,साक्षात् जीता जागता, हराभरा लहलहाता हुआ, पर तुम लोगों से देखा नहीं गया, काट कर फेंक दिया मुझे। ये मौसम मेरी सिर्फ चेतावनी है, अभी तोह मेरा कहर बाकी है।
शर्माजी को एहसास हुआ, कुछ सालों पहले कंस्ट्रक्शन के चलते उन्होंने सत्यम कॉलोनी के इर्द गिर्द लगे सभी पेड़ कटवा दिए थे। जिसमे कौशल्या के लिए ईश्वर रुपी पीपल, नीम और कॉलोनी के बीचों बीच लगा बट का पेड़ भी शामिल था, जिसे कटवाकर शर्माजी और कॉलोनी के लोगो ने भगवान शंकर का मंदिर निर्माण करवाया था।
शर्माजी और कॉलोनी के समस्त लोगो के रग रग में बहती हुई गर्मी ,प्रकर्ति पर हुए अत्याचारों के बदले में मिल रही ~~~~~~~~ग्लोबल वॉर(नि)ग~~~~~~~~~~~
का पल पल एहसास करा रही थी।

Tuesday, August 2, 2016

gizmo freak; गिज़मो फ्रीक


रोहन, शहर के जाने माने, प्रतिश्ठित, समृद्ध और शक्तिशाली उद्योगपति कपूर साहब की शहर के ही टॉप के इंग्लिश मीडियम स्कूल की बारवीं कक्षा में पढ़ने वाली एकलौती संतान थी।
लाजमी था, बचपन से ही रोहन सारे सुख, भौतिक संसाधनों और सुविधाओं के बीच पैदा और पला बढ़ा था।
कष्ट, दुःख, तकलीफें,परेशानियां और समस्याएं किसको कहते हैं, रोहन जानता ही नहीं था।
देर रात तक अपने 40 X 40 के आलीशान बैडरूम में बेड के सामने लगे 90 इंच के sony एल.ईडी में पसंदीदा इंग्लिश मूवीज देखे बिना रोहन को नींद नहीं आती थी।
सुबह रोहन के उठने से पहले,दाताराम जूस का गिलास लिए तैनात रहते थे, जूस ख़त्म करते ही jaguar की एक्सेसरीयो से लैस बाथरूम में लगे वाय-,फाय संचालित स्पीकरों में गाने सुनते हुए नहाकर रोहन बाहर आते ही भोला द्वारा हाँथ में पकड़ी हुई स्कूल ड्रेस पहनता था। साथ ही साथ उसका एप्पल 6 एस प्लस फ़ोन ,ब्लूटूथ से कनेक्टेड स्पीकरों पर सोशल मीडिया के अपडेट'स उसे सुनाते थे।
शुद्ध शाकाहारी भोजन से वंचित रोहन फ्रेंच फ्राइज का नाश्ता करने के बाद अपनी मर्सडीज़ x1 में बैठकर स्कूल चला जाता।
स्कूल के लंच ब्रेक में जब क्लासमेट्स जल्द टिफिन ख़त्म करके ग्राउंड में खेलने दौड़ पड़ते, तब रोहन छुपा के लाया हुआ, अपने sony PSP पर गेम्स खेलता रहता।
स्कूल के टीचरों द्वारा असाइनमेंट, प्रैक्टिकल नोटबुक, यूनिट टेस्ट, हाफ इयरली वगेरह में शून्य बटा सन्नाटा की स्थिति में पड़ती हुई डाटों को कनबहरी करने की अद्भुत कला को रोहन ने अपने अंदर जबरदस्त रूप से विकसित कर लिया था।
एग्जाम की कॉपियां भले ही जीरो से सुस्सजित हो,पर "कैंडी क्रश सागा" के सारे लेवल पार करने में रोहन को महारथ हासिल थी , स्कूल के समस्त टीचर्स रोहन को "टॉकिंग टॉम", प्रतीत होते थे। उनके कार्टून सैमसंग गैलेक्सी नोट 2 पर बना बना रोहन सोशल मीडिया पर पोस्ट करता रहता ।
परीक्षाओं की घडी जब-जब आती तब-तब रोहन की उँगलियों और सर में भयंकर दर्द होता, क्योंकि लिखने की तुलना में वो अपने आप को मोबाइल और लैपटॉप में टाइपिंग करने में ज्यादा कम्फ़र्टेबल महसूस करता।
उद्योग की असीम व्यस्तता में लीन कपूर साहब और किटी पार्टियों से जब कभी फुरसत मिलती ,तब कभी कभार रोहन को मम्मी पापा के और उनको रोहन के दर्शन होते थे। इस औपचरिक्ता की रोहन को कभी जरुरत महसूस नहीं होती थी, क्योंकि वो अपने कुछ बहुत पक्के दोस्तों के साथ हमेशा मशगूल रहता था।
यह दोस्त उसका साथ कभी नहीं छोड़ते थे , वे थे फेसबुक, वॉट्सएप्प, ट्विटर, लाइन और वाइबर।
कॉलोनी के दोस्त जब रोहन को क्रिकेट खेलने के आवाज देते, तब पिछले साल हिम्मत करके क्रिकेट का एक गेम खेलते वक़्त फूली हुई सांस को याद करके , रोहन उन्हें मना कर देता और यह कहकर की मुझे अभी GTA san Andreas का बारवां लेवल पार करना है।
बारवीं की कॉमर्स संकाय की मार्कशीट पर 47% का आंकड़ा लेकर और वेइइंग मशीन पर वजन का 102 किलो का आकड़ा लेकर वक़्त रोहन उसकी बढ़ती हुई गैजेट्स की सूची के साथ घसीटते हुआ आगे ले जा रहा था।
टेक्नोलॉजी के इस युग में ऐसी कोई गैजेट नहीं थी जो इसी युग में पले बढे रोहन के पास न थी। उनसे थोड़ी देर की भी दूरी रोहन बर्दाश्त नहीं कर सकता था।
शहर के ही बेस्ट आर्ट्स और कॉमर्स कॉलेज में प्रवेश की औपचारिकताएं अपने मैनेजर से ख़त्म करवाके , कपूर साब अपने बेटे रोहन को चीन की राजधानी शेंघाई कुछ दिनों के लिए व्यापार के गुण सिखाने ले गए। शेंघाई न सिर्फ चीन बल्कि पूरी दुनिया में गैजेट्स की राजधानी के नाम से प्रसिद्ध थी ।
इसी प्रसिद्धि का पूरा लाभ लेते हुए रोहन व्यापार को फालतू समझते हुए, और ढेर सारे गडेट्स लेकर अपने शहर वापस लौट आया।
चीन की यात्रा में बिज़नेस से समन्धित एक टेंडर पास होने की ख़ुशी में कपूर साब ने अपने बंगले में एक शानदार पार्टी दी, रोहन को मजबूरन सबसे स्मार्टफोन की ओर देखते हए मिलना पड़ रहा था। ...........थोड़ी दूर से दोस्त की आवाज ने रोहन का ध्यान खींचा।
सबसे मिलते हुए , कोल्ड ड्रिंक्स पे कोल्ड ड्रिंक्स पीते हुए रोहन का वक़्त बीत रहा था,,,,,,,मिसिज़ कपूर के फ्रेंड्स के आग्रह करने पर उन्होंने रोहन को उनसे मिलवाने के लिए मिसिज़ कपूर ने अपने नौकर को रोहन को बुलाने के लिए कहा।
कुछ ही मिन्टो में ना आने पर और पास ही लगी भीड़ की ओर नजर पड़ते ही मिसिज़ कपूर और उनके फ़्रैंडस ने दौड़ लगाई । भीड़ को हटाने के बाद ,रोहन को जमीन पर पड़े देकब देख उनकी हालत ख़राब हो गयी।
रोहन को एकाएक जबरदस्त चक्कर आने की वजह से सिर और कंधो पर गंभी चोटें आई थी ।
पास ही खड़े गंभीर रूप से घबराये हुए कपूर साब ने पार्टी मैं आये हुए अपने दोस्त और शहर के जाने मने एम्.डी इन मेडिसिन के डॉक्टर राजन द्वारा चेक अप करवाया।
डॉ राजन ने रोहन की फ़ौरन अस्पताल ले जाकर तमाम टेस्ट करवाये। जिनकी रेपिर्ट्स ने अगली सुबह कपूर साब के होश उड़ा दिए। रोहन की ज़िन्दगी के रिपोर्ट कार्ड में इतने बड़े आकंड़े उनके सामने थे।
महज 18 साल की उम्र में रोहन के टेस्ट्स की रिपोर्ट्स में रीडिंग्स के कांटे मीटर फाड़ फाड़कर बहार आ रहे।
सब चिंताजनक फिगर 485 का था जो रोहन की ब्लड शुगर का था।
मेडिकल रिपोर्ट्स खींच खींचकर अपने बेटे रोहन के प्रति लापरवाही बरतने पर मिस्टर और मिसिज़ कपूर पर झन्नाटेदार झापड़ रसीद कर रही थी।
कपूर साब से गहरी मित्रता और रोहन की जीवनशैली से शुरू से ही वाकिफ डॉ राजन ने कमर कस्ते हुए उन्हें सुझाव दिया की , इससे पहले रोहन की मेडिकल कंडीशन्स और गंभीर रूप ले, उसे सबसे पहले उसकी वर्तमान दिनचर्या और उसी में समाये हुए सबसे घातक शत्रु गैजेट्स और जंक फ़ूड से अलग करना होगा।
अस्पताल में बने इंटेंसिव केअर यूनिट की तरह "किसी भी धुन,लत या नशे से मुक्ति दिलाने के लिए रोहन को देहरादून स्थित स्पेशल रिहैबिलिटेशन सेंटर में कुछ समय के लिए स्थानातरित करने का सुझाव डॉ राजन ने कपूर साब को दिया।
इस कठिन सुझाव के प्रति कपूर साब के सहयोग और रोहन के लाख इंकार के बावजूद उसे सेंटर शिफ्ट कर दिया गया।
वास्तविक दुनिया से पूर्णतः वंचित और वर्चुअल दुनिया में जीने वाले रोहन को सेंटर पहुँचते ही न तो मम्मी पापा और न किसी दोस्त की याद आ रही थी, क्यूंकि उसका परिवार और पूरी दुनिया उसके गैजेट्स थे,जिनकी अनुपस्थिति की तड़पन रोहन उर पूरे सेंटर को हलाकान कर रही थी।
पूरे 2 दिनोपरांत रोहन का चिड़चिड़ापन पूरे परवान पर था, क्यूंकि 2 दिनों से उसे सेंटर, वास्तविक जिंदगी की हकीकतों और उन क्रियाओं से अवगत करा रहा था जो रोहन ने पहले कभी नहीं देखि थी।
सेंटर की सख्त शैली में शामिल क्रियाएँ ,जैसे प्रातः 4 बजे उठाकर 2 घंटे का योग, फिर 2 किमी की चलयात्रा, साफ़ स्वच्छ एवं शाकाहारी भोजन ,फल, और क्रिएटिव एक्टिविटी जैसे पेंटिंग, पोट्टेरि, घुड़सवारी, गार्डनिंग, खेलकूद, वर्जिस इत्यादि और किसी भी प्रकार के नुकसानदायक भौतिक संसाधन का पूर्ण वर्जिकरण, रोहन की आत्मा कंपा रहे थे।
कुछ दिनों के बाद रोहन का हेल्थ स्टेटस लेने पहुंचे डॉ राजन के माथे से ac में तब पसीन निकलना शुरू हुआ ,जब उन्होंने देखा की रोहन की हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है, देश के बेहतरीन डॉक्टरों के ट्रीटमेंट 
और सेंटर की शानदार केअर के बाद भी रोहन में फिजिकल से कहीं ज्यादा मेन्टल/न्यूरोलॉजिकल,,, डिस्टर्बेंस/डिसऑर्डर आ रहे हैं।
रोहन से मिलने की चेष्टा के बाद जब डॉ राजन रोहन के सामने पहुंचे तोह इन्हें देख , रोहन उनके पाँव पकड़ते हुए, गिड़गिड़ाते हुए अपने गैजेट्स की मान्ग करता रहा। सब कुछ मन होने पर सिर्फ एक बार के लिए रोहन ने अपने स्मार्टफोन की मान्ग की। 
रिश्ते में न सही ,पर अपने बेटे जैसे रोहन की हालत डॉ राजन से देखि नहीं जा रही थी,इसलिये सेंटर के सख्त नियम और कपूर साब की शख्सियत के बल पर , पहली बार सेंटर के पेशेंट सेक्शन में अच्छी तरह पैक करवा कर केवल 10 मिन्टो के लिए किसी स्मार्टफोन को लाया गया था।
स्मार्टफोन के साथ आये मिस्टर और मिसिज़ कपूर वन साइडेड कांचं से अपने बेटे को देख रहे थे।
अपने फ़ोन को हांथों में देख रोहन के आंसूं रुक नहीं रहे थे। कुछ देर इस्तेमाल करने में बाद रोहन ने चैन की सांस लेते हुए अपना फ़ोन वापस कर दिया। और अपने दुर्बल पड़ चुके शारीर और हौसले को लिए रोहन चुपचाप अपने कमरे में लौट गया।
डॉ राजन मीटिंग के सिलसिले में सेंटर के पास स्थित गेस्ट हाउस में रुके रहे, मिस्टर कपूर ने बिज़नेस के सिलसिले में सिंगापुर की फ्लाइट पकड़ी और मिसिज़ कपूर भी शहर लौट गयीं।
उसी रात के ठीक तीन बजे फ़ोन की घंटी और फ़ोन में मिले मेसेज सुनने के बाद ,डॉ राजन बिजली से भी तेज गति से सेंटर की ओर भागे, रोहन को डॉक्टरों से घिरा हुआ देख और उनके कमेंटस ने डॉ राजन के होश उड़ा दिए।
रोहन ने कॉमन टॉयलेट रूम में रखी एसिड की पूरी पौन लीटर की बोतल पी ली थी। और स्पेशलिस्टस के मुताबिक सीवियर डायबिटिक और मेडिकल कंडीशन्स के चलते रोहन को बचाना नामुमकिन था।
थोड़ी देर में हुआ भी वही, रोहन तड़पते हुए अपने प्राण त्याग चुका था। हलक में अटकी हुई सांस लेकर डॉ राजन सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे की इस खबर का सामना वो कपूर साब से कैसे कराएंगे?
अगली सुबह खबर मिलते ही मिस्टर और मिसिज़ कपूर का शारीर, सोच और साँसे सुन्न पड़ चुकी थी ।अपने हज़ारों करोडों के कारोबार को भविष्य में सँभालने वाली एकलौती संतान को खोने का दर्द उनके लिए असहनीय था।
गतिवान वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता, उसके बीतते तेरह दिनोपरांत , कपूर साब रोहन के रूम में लगी उसकी तस्वीर को निहारते हुए यह सोच रहे थे जिस आत्मीयता और पालन पोषण की रोहन को जरुरत थी , उससे वंचित रखकर उन्होंने कितना बड़ा पाप किया है।
इतने में ही सेंटर द्वारा लौटाया हुआ रोहन का फ़ोन कपूर साब द्वारा ऑन करते ही नोटिफिक्शन्स से बज उठा। फेसबुक ओपन करते ही कपूर साब ने देखा ,रोहन ने सेंटर से अपनी आखिरी सेल्फी पोस्ट की थी । साथ में लिखा था
"" फीलिंग बोर विथ दिस लाइफ, अपना ख्याल रखना मेरी गैजेट्स ,टाटा""।
मेसेज को देखने के बाद,कपूर साब गैजेट्स से सजे हुए रूम को देखकर नम आँखों से एक ही बात सोच रहे थे की, उन्होंने रोहन को इंसान बनाने की बजाए महज एक चलता फिरता "गिज़मो फ्रीक" बना दिया था।
गिज़मो फ्रीक