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Saturday, October 8, 2016

सुखालस्य कटिबंध; Comfort Zone

घड़ी के बड़े कांटे के दोपहर के 1.29 पर पहुँचते ही "एकल खिड़की पर बैठीं "पदमा देवी" के कानों पर पीछे दूर बैक ऑफिस की सीट पर बैठे "प्रेमलाल धुर्वेजि" के मुख से मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है ,
 "मैडम जी...........चलिए "लंच" का समय हो गया"।
 पास ही की टेबल पर बैठे "हरीश कुमार" कहते हैं की सर अभी 11.00 बजे ही तोह स्नैक्स लिए थे, इतनी जल्दी भूख लग आई ? 
हरीश वाक्य ख़त्म ही नहीं कर पाते की अचानक कमरे में "ज्ञानदास कुशवाहाजी" प्रवेश करते हुए "लंच", "लंच" से माहौल सराबोर करते हैं। जिसे सुनते ही ,!!!!
 भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के
 "जबलपुर टेलिकॉम ऑफिस (जे.टी.ओ) के विभिन्न विभाग और उनमे पदस्थ कर्मचारियों की टीम जैसे :- 
सेंट्रल बैकअप सिग्नल ट्रांसमिशन -टीम A
 "डेटा वन" एंड "एक्सेल" कण्ट्रोल - टीम B 
लैंडलाइन एंड सिस्टम कंट्रोल्स - टीम C
ब्रॉडबैंड एंड HTTPH सर्विसेज - टीम D , 
इत्यादि की तरह 
"ग्राहक सेवा केंद्र", मे आई हेल्प यू, - की "टीम E" के कर्मचारी:-
 46 वर्षीयश्री ज्ञानदास कुशवाहा (सीनियर सेक्शन इंजीनियर) 
48 वर्षीय श्री बंसीलाल चोलेरा (सीनियर अकाउंट ऑफिसर)
 40 वर्षीय श्रीमती सुनीता रानी (प्रीपेड/पोस्टपेड भुगतान)
 50 वर्षीय श्री प्रेमलाल धुर्वे (कंप्लेंट हैंडलिंग) 
41 वर्षीय श्रीमती पदमा देवी (लैंडलाइन/ब्रॉडबैंड) 
और 30 वर्षीय श्री हरीश कुमार (ट्रेनी) 
अपने अपने लंच बॉक्स लिए अस्वेछिक सी अवस्था में कैफेटेरिया की ओर बढ़ते हैं।
 "घ्यासिलाल (पिऊन) रोजमर्रा की तरह , सलाद, पानी इत्यादि के इंतेज़ाम में लग जाता है।
1.30 से 2.00 और 2.00 से 2.15 का समय भारी भरकम और लजीज लंच व्यतीत होता है। 
भोजन से आई सुस्ती को भगाने हेतु घ्यसिलाल कड़क चाय हाजिर करता है, 

अंदर जहाँ चाय की चुस्कियां टीम E की सुस्ती भगा रही थीं, वहीँ बहार गुस्से से झल्लाई और शिकयातों/कम्प्लेंट्स, बिल भुगतान जैसी समस्याओं का राशन पानी लिए खड़ी ग्राहकों की टीम का आक्रोश बढ़ा रही थी। ग्राहकों की कतार में :-..........
श्री भैया लाल जैन (15 दिनों से बंद पड़े लैंडलाइन फ़ोन की कंप्लेंट) की वजह से, 
बंटी जैसवानी (इंटरनेट बंद होने ) की वजह से 
मुकुल आनंद (सिम एक्टिवेट न होने) की वजह से
 मृगेन्द्र श्रीवास्तव (फ़ोन बिल ज्यादा आने) की वजह से 
इत्यादि , इत्यादि वजहों से एकल खिड़की पर नजरें जमाये खड़े रहते हैं, 
"पदमा देवी के आते ही , भैया लाल जैन को प्रतीत होता है मनो , स्वयं दुर्गा देवी अवतरित हो गयीं हों। 

कतार की समाप्ति भी नहीं हो पाती की रोज की तरह एक बार फिर घडी की सुई 5 बजा देती है, और सभी टीमों की तरह टीम E भी काम बंद करते हुए घरों की ओर निकल पड़ती है। 

जहाँ एक तरफ, सन् 2000 से 2007 तक के अपने परिक्रमण काल में 41 हजार करोड़ के नेट रेवेन्यु के साथ टेलेकम्युनिकेशन्स के क्षेत्र में भारत देश में एक छत्र राज करने वाली बीएसएनएल की स्थिति, सिर्फ 4 सालों में 10 हजार करोड़ के घाटे से अर्श से फर्श पर आने की वजह से "दिल्ली" में बैठे आला अधिकारीयों की बीपी और शुगर बढ़ा रही थीं, 

वहीँ दूसरी ओर सरकारी पटरी पर घिसट रही देश भर में स्थित कंपनी के जोन्स की टीमों की पैसेंजर गाड़ी रिवर्स गेयर में चल रही थी। 

जे.टी.ओ की हर सुबह, सदियों से चली आ रही प्राचीन दिनचर्या लेकर आती, वही 8 घंटे की शिफ्ट में 4 घंटे का मूल कार्य। वही कतारों में खड़े ग्राहकों द्वारा शब्दकोष में नए नए निंदनीय किल्विष शब्दों की खोज कर संकलन करना, और वही नियमित रूप से कंपनी की प्रगति के ग्राफ का नीचे आना। 

हमेशा की तरह, हर माह की आखिरी तारीख पर होने वाली आर.ओ मीटिंग का नोटिस साइन करके ,
टीम E, श्री. अमरेश सिंह, जो की विगत 4 वर्षों से जे.टी.ओ में बतौर एस. डी.ओ के रूप में पदस्थ थे , के चैम्बर में प्रवेश करती है, 
स्वभाव से सरल, शख्सियत से सघोष और नेस्ति कृति का मुखमंडल लिए सिंह साब अत्यंत धीमे स्वरों से अक्टूबर माह में जबलपुर के विभिन्न टेलीफोन एक्सचेंज से पार होते हुए , जे.टी.ओ में एकत्रित हुई शिकायतों के पुलिंदे पर चर्चा शुरू करते हैं। 
जिसे सुनते ही एक एक करके सभी टीम मेंबर्स अपने अपने तर्कों का नृत्य पेश करते है ,जैसे :- 
कुशवाहाजी - सर यह मेरा काम "नहीं" है 
चोलेराजी - सर, सुनीता मैडम को बोला तोह था! पर?
 सुनीता रानी- सर, धुर्वेजी , एक्सचेंज गए तोह थे,,,,,पर? 
धुर्वेजि- सर, एक्सचेंज में कोई था ही नहीं ?
 पदमा देवी - सर, मैं तोह एक हफ्ता छुट्टी पर थी न, ननंद आई थी न! 
हरीश - सर, मैं तोह न्यू जॉइनिंग हूँ! 
मीटिंग का मुद्दा किसी फुटबॉल की तरह यहाँ से वहां घूमता रहता, पर उसे गोल पोस्ट न मिलता। 
यही हाल किसी नयी जिम्मेदारी के प्रस्तावों के साथ होता, टीम का हर सदस्य नयी जिम्मेदारी से इस कदर भयभीत होता जैसे नेवले को देखकर सर्प भयभीत होता है, कोई भी टास्क या कार्य न लेने की अद्भुत कला सभी कर्मचारियों ने अपने अंदर जबरदस्त रूप से विकसित करी थी, जिसमे प्रस्ताव पारित होने पर,
 तर्क पर तर्कों की तीरंदाजी के हुनर से टीम E हमेशा की तरह सिंह साब पर हावी होते हुए उन्हें भीष्म पितामाह की तरह बाणों की शैय्या पर लिटा देती है। 

टीम E की तरह, समस्त विभागों की एस. डी.ओ के साथ,और समस्त एस.डी.ओ की उप-महाप्रबंधक (श्री दपांजन बनर्जी) के साथ मीटिंग्स की कड़ियों की अपार विफलताओं से बीएसएनएल जे.टी.ओ में रखी सदियों पुरानी मशीनों से ज्यादा जंग कर्मचारियों में लग चूका था , 
जिसकी लचरता का फायदा , बीएसएनएल के सबसे बड़े और बेहद शक्तिशाली शत्रु , प्राइवेट कहलाने वाले : भारती एयरटेल, आईडिया, और टेलिकॉम दुनिया के बाहुबली "रिलायन्स" बड़ी मौज से उठा रहे थे, 
जिन्होंने महज कुछ ही सालों में विशालकाय बीएसएनएल की कमर तोड़ दी थी। 

बढ़ते समय की तरह प्रगतिशील महँगाई का ध्यान करते हुए 19 दिसंबर की दोपहर के लंच के दौरान, मिलने वाली तनख्वाह से असंतुष्ट पदमा देवी टीम E से तनख्वाह में बढ़ोतरी (इन्क्रीमेंट) के लिए हड़ताली मुद्दा छेड़ती ही हैं, 
की अचानक!!!!
 घ्यसिलाल , चाय की जगह, बनर्जी साब के तबादले की खबर लेकर आता है।

 नए उप-महाप्रबंधक की मन में छवि उकेरते हुए, कुछ देर के लिए सक्ते में आई टीम E ,सिंह साब से मिलते हुए, अंतिम औपचारिकताएँ पूरी कर रहे बनेर्जी साब से मिलती है, साहब बताते हैं की ,
 इस बार जे.टी.ओ के नए उपमहाप्रबंधक का अलॉटमेंट दिल्ली हेड क्वार्टर से "क्वालिटी एश्योरंस, इंस्पेक्शन एवं विजिलेंस विभाग की तरफ से हुआ है। 

यह सुनते ही टीम E (जिसने अभी-अभी भारी भरकम लंच किया था) के पेट में dj बजने लगता है, और सभी शौचालय की ओर रुख करते हैं। 

कुछ दिनोपरांत 1 जनवरी का सूरज, 
बीएसएनएल (जे.टी.ओ) के नए उपमहाप्रबंधक के रूप में "55 वर्षीय श्री हेमंतराव ठाकरे" (जो की "मुम्बई" जोन में बतौर उप-संचालक थे) को लेकर आता है। 

महज साढ़े चार फुट का कद, मुख पर मर्मरूपी मुस्कान, और मस्तिष्क में योजनाओ की मन्दाकिनी लिए ठाकरे साब अभिनंदन रस्म में "चाटुकारिता का सैलाब लिए" समस्त टीमों से अवगत होते हैं। 
जहाँ एक तरफ, नए उपमहाप्रबंधक की अज्ञात कार्यशैली की गहन कल्पना करते हुए, सभी टीम सदस्य मन ही मन अपने अपने नवीन तर्कों का जाल यह सोचकर बुनते रहते की न जाने "काम" के रूप में कौन सी नयी विपदा आन पड़े। 
तोह वहीँ 
दूसरी ओर ठाकरे साब , जे.टी.ओ की कार्यप्रणाली के गूढ़ सर्वेक्षण में दिनों रात लीन रहते। 
पूरा एक महीना बीतने जाने के बाद, कोई विशेष हरकत न होने पर और 31 जनवरी पर आर.ओ मीटिंग न होने पर , चैन की सांस लेते हुए सभी टीम मेंबर अपनी अपनी दैनिक दिनचर्या पर मस्त होते हैं।
 लेकिन पूरे 58 दिनोपरांत, लंच टेबल पर आर.ओ मीटिंग के नोटिस को देख अचानक सब स्तब्ध होते हैं, 
जिस पर बीएसएनएल के इतिहास में पहली बार , समस्त एस. डी.ओ के साथ साथ सभी टीम मेंबर्स की एक साथ मीटिंग का "स्वयं ठाकरे साब" द्वारा लिया जाने का निर्देश छपा था। 
धुर्वेजी के चाय पूछ्ने पर घ्यसिलाल बताता है, की आज की चाय ठाकरे साब के चैम्बर में पिलाई जाएगी । 

चैम्बर में सभी का स्वागत, ठाकरे साब अपनी प्रचलित मुस्कान से करते हैं, परिवार, घर द्वार, इत्यादि की जनरल बातें और चाय के बाद, ठाकरे साब सबको हिदायत देते हैं, 
जब, यहाँ से आप सब अपनी टेबलों पर पहुचेंगे तब उस पर आपको एक "बुकलेट" मिलेगी जिस पर छपे निर्देशों का आपको त्वरित पालन करना है, ध्यानवाद। 

बुकलेट पढ़कर सभी के होश उड़ जाते हैं, जिसमे क्रमशः निर्देश अंकित रहते है, जैसे:-
 1. पूरे 301 बहाने/तर्क की सूची, (इनके उपयोग का पूर्ण वर्जिकरण) 
2. मात्र 1 महीने के भीतर , साथ सलग्न सभी फाइलों पर एक्शन एवं बिना किसी विलम्ब के उपचारिक निष्कर्ष।
 3. हर किस्म की छुट्टी का रद्दीकरण
 4. 31 मार्च को , आर.ओ मीटिंग में सीधी रिपोर्टिंग। 
उपर्युक्त चारों नियमों का पालन न होने पर 
1 महीने का नोटिस और 30 अप्रैल को , बीएसएनएल से सीधा सीधा टर्मिनेशन/निलंबन, 
जिसका प्रमाण "ठाकरे साब" को सीधे हेड क्वार्टर से दिए हुए आधिकारिक पॉवर की संलग्न प्रतिलिपि दे रही थी।

 इतने बड़े प्रेशर को अपने कार्यकाल में पहली बार देख , सभी कर्मचारी अपने स्वस्थ में अचानक गिरावट महसूस कर रहे थे। 
पदमा देवी के हड़ताली मुद्दे को दोबारा छेड़ने पर चोलेराजी कहते हैं , हड़ताल तोह कर लेंगी, पर किसके के सामने, मंडल ने तोह सारी शक्तियां इस ठाकरे को दे रखीं हैं। 

महज एक हफ्ते में पूरा जे.टी.ओ एक बवंडर का रूप ले लेता है ,जहाँ हर तरफ अफरा तफरी मच जाती है। न कोई बोनस और वही की वही तनख्वाह और इतने बड़े प्रेशर से हलाकान कर्मचारियों में, जहाँ सुनीता रानी का बीपी 200 पार कर रहा था, वहीँ कुश्वाहाजि की शुगर ग्लूकोमीटर की रीडिंग का 400 के आंकड़े से साथ बाजा फाड़ रही थी।
 साथ का लंच, चाय और टेबल टेनिस तोह इतेहास बन चुका था। 

तर्कों के हुनर के साथ साथ, सभी कर्मचारियों में एक और कला थी , वो थी नामकरण की , जिस तरह बनेर्जी साब सब के बीच "मोटा भालू" के नाम से प्रचलित थे, उसी प्रकार, सख्त ठाकरे साब भी, महज ढाई महीनो में "छोटा दैत्य" के नाम से विख्यात हो चुके थे। 

प्रकांड पुजारी , कुशवाहा जी , एक सुबह एक बोरी भरकर पूजा अर्चना द्वारा सिद्ध किये हुए नारियल लाते हैं, और सभी को वितरित करते हुए कहते हैं, की मैंने माँ दुर्गा के समक्ष मन्नत मांगी है की यह "छोटा दैत्य" आर.ओ मीटिंग के पहले ही चला जाए। 
इसलिए आप सब अपना अपना नारियल संभाल कर रखें ,क्योंकि गर मन्नत सफल हुई तोह छोटे दैत्य के जाते ही ,अपन सब उसी के चैम्बर में नारियल फोड़ेंगे।

 दैत्य का पलायन तोह नहीं होता, परंतु आर.ओ मीटिंग का दिन जरूर आ जाता है !....

 सालों से कार्यों को टालने एवं अत्यंत धीमी गति से अंजाम देने के संजाल में फंसी सभी टीमें, जैसे तैसे , लीपा पोती करके रिपोर्ट्स तैयार करतीं हैं, काम भी 65 फीसदी सिर्फ कागजों में ही रहता हैं। 
इकट्ठे सामूहिक निलंबन तोह नहीं हो सकता, इस एक मात्र आशा के साथ टीमें आर.ओ मीटिंग में कुर्सियां ग्रहण करती हैं।
 निर्देश के मुताबिक, होता भी वही है, 
सबके नोटिस पहले से ही सामने के मेज पर चाय के बाजू में रखे रहते हैं। लिफाफे पर सबको नोटिस पूरा पढ़ने का अनुबोध दिया जाता है, नोटिस के अंत में "लाल स्याही" से अंकित दुसरे निर्देश को देख सभी चौंकते हैं ! जिसमे सभी को एक मौका दिया जाने की बात लिखी रहती है........... 

बीएसएनएल के डुबते जहाज को बचाने की मुहीम में जुटी "टेक्निकल टीम" के साथ ठाकरे साब के किये हुए परीक्षणों एवं उनके परिपालन का जिक्र होता है। 
जबलपुर समेत समूचे प्रदेश एवं देश में , बीएसएनएल की ब्रॉडबैंड सेवा कंपनी की प्रधान संगठन में आती थी। 

जहाँ तहाँ अंडरग्राउंड लाइनें खुदने की वजह से "ब्रॉडबैंड" भी ध्वस्त हो रहा था, इसी के स्थायी निवारण हेतु बीएसएनएल अपना नवीनतम प्रोडक्ट "वायरलेस" ब्रॉडबैंड सेवा "WIMAX" आरम्भ करना चाहती थी, 

जिसके लिए जे.टी.ओ की टीम की असीम मेहनत और लगन की जरुरत थी। 
नोटिस में दिए निर्देश के अनुसार , 
अगर सभी टीमें "wimax" की लॉन्चिंग को सफल बनाने में ठाकरे साब का साथ देती है, तोह, शायद निलंबन स्थगित किया जा सकता है। 
स्वाभाविक रूप से सभी टीमें कार्य में जुट जाती हैं, पुरानी शिकायतों का निवारण सर्वप्रथम किया जाता है ,

युद्ध स्तर पर कार्य चलता है, 

आखिरकार, 6 महीनों की असीम मेहनत के उपरांत
 Wimax ,न सिर्फ लॉन्च होता है, बल्कि पूर्णतः सफल होता है, मात्र 2 महीनों में डेढ़ हजार से ज्यादा कनेक्शन , एयरटेल और रिलायन्स के मुकाबले बीएसएनएल के खाते में आते हैं। 

ग्राहकों का अपने पुराने बीएसएनएल पर टूट चूका विश्वास वापस लौटने लगता है। जिसके फलोपरांत बीएसएनएल के दुसरे प्रोडक्ट जैसे, "सेल वन", "एक्सेल" और लैंडलाइन को भी काफी राहत पहुँचती है। 

फ़ोन पर कंप्लेंट,
 एस. डी.ओ को ईमेल, 
लिखित शिकायतें इत्यादि धीरे धीरे कम होने लगते हैं। और जमींदोज हो चूका बीएसएनएल का ग्राफ वापस ऊपर जाने लगता है, और सालों से घाटे की सूरत देख रही बीएसएनएल, पहली बार मुनाफा देखती है। 

यह सबके के चलते , ठाकरे साब का नोटिस , कार्य में मशगूल टीमें तोह भूल ही जाती हैं। जिसकी शायद ठाकरे साब को भी जरुरत नहीं पड़ती। 

अपनी गति से गतिवान समय, बढ़ता रहता है और 2 साल बीत जाते है, दशहरा की छुट्टियां आती है ,
जो सबको मिलती भी हैं, 
छुट्टियों से लौटने पर, सब एक खबर से स्तब्ध रह जाते हैं की !!!!
 ठाकरे साब वापस "मुम्बई जोन" स्थानातरित हो चुके हैं!!!
 दिमाग सुन्न पद जाता है, 
कोई कुछ समझ नहीं पाता 
सभी टीमें अपने अपने एस. डी.ओ से मिलती हैं, जो ठाकरे साब के साथ अपनी अंतिम मुलाकात के बारे में बताते हैं की ठाकरे साब हकीकत में जा चुके हैं 

"दीवाली" आने से पूर्व, सभी एस. डी.ओ , ठाकरे साब से किये हुए वादे के अनुसार , समस्त टीम मेंबर्स को एक एक करके लिफाफे में बंद नोटिस देते हैं। 

जिसे खोलते ही , किसी की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता, 
!डबल प्रमोशन
 ! 3 गुना इन्क्रीमेंट और 5 साल का एरियर !
 दीवाली पर स्पेशल बोनस 
और ठाकरे साब का एक "ख़त"............ 

मेरे 
प्रिय साथियों, 

मैं अच्छी तरह जानता हूँ, की मैंने अपने इस सूक्ष्म कार्यकाल में आप सबसे से पारस्परिक सभाओं एवं क्रियाओं के दौरान, सिर्फ और सिर्फ कड़वे अनुभव दिए हैं। 
पर क्या करूँ , मजबूर था, बीएसएनएल से बेहद प्यार जो करता हूँ। 
जिस बीएसएनएल ने मुझे रोजगार, समाज में पहचान, मान सम्मान दिया, उसे अपनी आखों के सामने कैसे डूबने देता। 
बल्कि यूँ कहूं तोह, बीते वक़्त में जो उपलब्धि बीएसएनएल, जबलपुर, जे.टी.ओ ने हासिल की है। उसमे मेरा एक तरीके से कोई हाँथ नहीं, वह तोह आपकी ही मेहनत है। 
सुनने में कड़वा लगेगा पर है "सच"। 
दरअसल, सरकारी चादर ओढ़कर आप सबने अपने आपको एक किस्म के """"""सुखालस्य कटिबन्ध"""""" एक कम्फर्ट जोन के भीतर समेट लिया था। 
जिसके दुष्परिणाम स्वरुप, आप अपने ही भीतर छिपी , शक्तियों और गुणवत्ताओं को न ही पहचान पा रहे थे और ना ही बाहर आने दे रहे थे। 
जिस वजह से अपनी बीएसएनएल का यह हश्र हुआ था।

मैंने, बस वह चादर हटाई है, वह कटिबंध तोडा है। 

आशा है , आप सब इसी गति और क्षमता से कार्य करते हुए, बीएसएनएल को बुलंदियों तक पहुंचाएंगे। 

Wimax की अपार सफलता, नवीनतम जे.टी.ओ और दीपावली की आपको एवं आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं। 

आपका अपना
 "छोटा दैत्य"

 पत्र ख़त्म होने पर , छोटा दैत्य नाम पढ़कर सकपकाई सी, टीमों का ऐसा कोई सदस्य न था जिसके आखों से अश्रु नहीं बह रहे थे। 

स्तब्ध अवस्था में सभी अपने अपने एस. डी.ओ के चैम्बर्स में पहुँचते हैं। भाव विभोर अवस्था में एस. डी.ओ बताते हैं, ठाकरे साब, कुछ से समय के लिए जे.टी.ओ की लचर हालत के सुधारीकरण हेतु आये थे, जो वे कर गए। 

कुशवाहा जी द्वारा लाये गये नारियल फूटने की बजाय , एक श्रीफल का रूप लेते हुए , मुम्बई स्थित ठाकरे साब के घर पहुँचते है, 

साथ में जबलपुर जे.टी.ओ के कर्मचरियों द्वारा, उनके पुनः आगमन की दरख्वास्त लिखी रहती है I





विकास पाण्डेय (९-१०-२०१६)

Saturday, September 24, 2016

वक़्त की क्लास; TIME'S ARRIVAL

सफ़ेद होंडा सिटी में लगे केनवुड के शानदार म्यूजिक सिस्टम की प्ले बटन दबाते हुए , ऑफिस से रात 10 बजे थके हारे लौट रहे 39 वर्षीय "वीरेंद्र कुमार" , जगजीत सिंह की सुप्रसिद्ध और एकमात्र तेज गति वाली गजल "चाक जिगर के सी लेते हैं" लगाते हैं। 

गजल का मधुर संगीत, नेशनल हाईवे क्रमांक 148A पर अगस्त के अंत की रिमझिम बारिश, और स्टोवेज में रखा कारल्सबर्ग का बड़ा कैन, कुमार साब की दिन भर की थकान मिटाने की तय्यारी कर रहे थे। 
गजल की 3 पंक्तियाँ भी ख़त्म नहीं हुईं थीं की, स्पीकरो पर फ़ोन की घंटी बज पड़ती है, जिस पर कुमार साब के सीनियर "नायरजी" निर्देश देते हैं की उन्हें प्रोजेक्ट के सिलसिले में कल सुबह पुणे निकलना होगा, टास्क और फ्लाइट टिकट्स मेल कर दी गयीं हैं। गाड़ी किनारे लगाकर आक्रोशित कुमार साब मेल चेक करते हैं, जितनी तेजी से मेल पढ़कर उनका आक्रोश चढ़ता है उतनी ही तेजी से मेल में लिखे आखिरी सन्देश को देखकर न ही सिर्फ शांत होता है बल्कि कुमार साब को उत्साहित भी कर देता है, मेसेज के आखिरी भाग बताता है की कंपनी के एम्प्लाइज कुमार साब के ट्रेनिंग सेशन के लिए काफी रुचिवान् हैं जिसका उन्हें बेसब्री से इंतज़ार है। 

हलकी मुस्कान लिए और अपनी ज़िन्दगी के अब तक के सफ़र की याद करते हुए कुमार साब घर की और आगे बढ़ते हैं। 

"वीरेंद्र कुमार" ......उत्तर प्रदेश के "आजमगढ़" जिले की "लालगंज" तहसील के "सर्रा" गाँव में रहने वाले एक गरीब परिवार से थे।
 बड़ा आदमी बनने के सपने और मजबूत इरादों को लिए वीरेंद्र ने असीम कष्टों से भरा बचपन पार किया था। लालगंज से हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद, वीरेंद्र ने छोटी मोटी नौकरी कर "बनारस हिन्दू विश्विद्यालय" से बी. कॉम की पढाई पूर्ण की थी। जिसके उपरांत पुणे की छोटी मोटी कंपनियों में अकाउंटेंट की नौकरी करते करते पुणे के ही एक प्राइवेट कॉलेज से एम. बी.ए (मार्केटिंग) की डिग्री प्राप्त की थी , जहाँ उन्हें अपनी जीवन साथी "नंदिनी" भी मिली थीं, जो की सदृश्य रूप से एम. बी.ए (hr) की पढ़ाई कर रही थीं। 

बढ़ते समय और कड़ी मेहनत के साथ खुदको को सफल पद और उचाईयों पर देखने का सपना वीरेंद्र ने पूरा भी किया था, जो की गुड़गांव के महरौली के ग्लोबल पार्क में स्थित yyk इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बतौर मार्केटिंग हेड के पद पर कार्यरत वीरेंद्र साब की पोस्ट से साबित होता था। 

बीते वक़्त की याद करते और ड्राइव का आनंद लेते हुए वीरेंद्र महरौली से कुछ 21km की दूरी पर स्थित पायनियर पार्क के अपने फ्लैट पहुँचते हैं, घर पर नंदिनी (जो की "रैनबैक्सी फार्मास्युटिकल्स में hr मेनेजर थीं) और 10 वर्षीय बेटा अर्जुन रहते थे। 

नायर साब के निर्दशानुसार पुणे के हिंजेवाडी इलाके में राजीव गांधी आईटी पार्क में स्थित "कॉग्निजेंट" कंपनी की यात्रा के बारे में नंदिनी को बताकर वीरेंद्र प्रेजेंटेशन की तैयारी में जुट जाते हैं। अगली सुबह निकलते वक़्त नंदिनी ,वीरेंद्र को इतना ही कहतीं की !....वे अपनी "टाइमिंग" का ध्यान रखें।

 6 फुट की एथलेटिक कद काठी वाले वीरेंद्र साब ने बहुत मेहनत से मार्केटिंग और प्रेजेंटेशन की लाजवाब कला को अद्भुत रूप से अपने अंदर विकसित किया था। वीरेंद्र साब से पहली मुलाकात का फर्स्ट इम्प्रैशन इतना प्रभावशाली रहता था की उस्की छवि मिलने वाले पर जीवन भर रहती।

 अपनी कला और 15 सालों के कॉरपोरेट लाइफ के अनुभवों को पहचान कर एवं उन्हें तराशकर, वीरेंद्र साब विगत 10 वर्षों में विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनियों में "मैनेजमेंट इन कॉर्पोरेट लाइफ" पर लेक्चर सेशन देते आ रहे थे, जो की उनके मूल कार्यों से हटकर एक विशेष हॉबी के रूप में उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। 

उनके प्रेसेंटशन्स मुख्य रूप से :-
# स्ट्रेस मैनेजमेंट (तनावमुक्त वातावरण)
 # सेल्फ डिसिप्लिन (स्वानुशासन) 
# टाइम मैनेजमेंट (वक़्त प्रबंधन) 
# सक्सेस सीक्रेट्स (सफलता की कुंजी) 
इत्यादि पर आधारित रहते थे। 
वीरेंद्र साब की लिखी कुछ किताबें जैसे, 
# कॉर्पोरेट विक्ट्री
 # डोंट गेट annoyed ! 
# व्हाई स्ट्रेस , व्हेन there इस रिलैक्स? 
ने प्रोफेशनल एम्प्लॉयीज और नौजवान यूथ जो की एम. एन. सी कंपनियों में नौकरी के सपने देख रहे थे , के बीच धूम मचा रखी थी। 

उपर्युक्त सभी विषयों पर अपने निराले अंदाज में पेश करने की वजह से, वीरेंद्र साब की लोकप्रियता कॉरपोरेट्स में बढ़ती ही जा रही थी। कई ऐतिहासिक सेशंस की कड़ी में अगला पड़ाव , पुणे की कॉग्निजेंट का था। 

अपने प्रामाणिक कार्यों के समाप्तिकरण के उपरांत, वीरेंद्र साब के उस मोटिवेशनल सेशन की बारी थी, जिसका कॉग्निजेंट के एम्प्लाइज को बेसब्री से इंतजार था। सेशन के निर्धारित समय 2 बजे के अनुसार सभी एम्प्लॉइज सेमिनार रूम में एकत्रित हो चुके थे ! 

कई सालों से सीखने हेतु, राष्ट्रीय स्तर के मेंटर्स, मोटिवेशन स्पीकर्स, उत्कृष्ट शख्सियतों इत्यादि के सेशंस, शोज़ को फॉलो करते और भारतीय नागरिक की औसत मानसिकता को मद्देनजर रखते हुए वीरेंद्र साब ने एक अजीबोगरीब धारणा अपने अंदर बहुत दृढ़ रूप से बना ली थी, की जिस तरह मुसाफिर के लिए धुप के बाद ही छाँव का आनंद है, उसी तरह थोड़े से इंतेजार के बाद ही श्रोताओं के लिए सेशन की प्रबलता का एहसास है.................वीरेंद्र साब को हर सेशन के पहले अपने कॉलेज के दिन और कुछ बेहद असरदार वाक्ये याद आ जाते की कैसे "जगजीत सिंह" के शोज में घण्टो की इंतेजार के बाद जब वे मंच पर आते, उनके आगमन से भीड़ में उत्साह का उत्सव बस देखते ही बनता था।

 इन्ही कुछ अनुभवों के मिश्रण को वीरेंद्र साब ने अपने सेशन में "पब्लिक कांशसनेस" या सरल शब्दों में कहें तोह "माहौल खिचना या मौसम बनना" का नाम देकर उतार लिया था। 
इसी कांशसनेस को ध्यान में रख "वीरेंद्र साब" अपने हर सेशन या हर स्पीच से पहले, श्रोताओं को जानबूझकर थोडा इंतेजार कराते। "कॉग्निजेंट" में भी यही हुआ, 2 बजे की जगह 2 बजकर 40 मिनट पर वीरेंद्र साब ने जैसे ही सेमिनार हाल में एंट्री की, तालियों की गड़गड़ाहट ने उनकी रगों में उत्साह भरते हुए, कांशसनेस पर विश्वास को और प्रबल कर दिया। ...........

एक और शानदार सेशन 3 घंटे के उपरांत समाप्त हुआ, अंत में एम्प्लॉइज के साथ पारस्परिक प्रश्न उत्तर के दौरान किसी के "टाइम मैनजमेंट" पर सवाल पूछने पर वीरेंद्र साब ने काफी अच्छी स्पीच दी।

 सभी संतुष्ट, उत्साहित, एम्प्लॉइज वीरेंद्र साब की तारीफों के पुल बांधते और उनके लेट एंट्री लेने पर कुछ कटाक्ष करते हुए बहार आ गए। 

एक से एक हैरतंगेज सेशंस के सिलसिलों में कुछ नंदिनी की रैनबैक्सी कंपनी में सदृश्य रहे, हर सेशन में अपनी लेट एंट्री की गलत को लेकर नंदिनी , वीरेंद्र साब को टोकती रहतीं। परंतु अपनी हाजिरजवाबी के बेहतरीन हुनर से वीरेंद्र साब नंदिनी को निशब्द करते रहे। 

दोनों के बीच हर तर्कसंगति का अंत नंदिनी की वाक्य से होता की "आप अपनी हर मोटिवेशनल क्लास में टाइम मैनेजमेंट पर लेक्चर तोह दे देते हैं पर खुद लेट एंट्री लेने का श्रोताओं पर पड़ रहे गलत असर को आप शायद देख नहीं पा रहे", इसे सुधारिये वरना यह छोटी सी गलती आप पर एक दिन भारी न पड़ जाए। 

अपनी गति से गतिवान वक़्त वीरेंद्र साब की लोकप्रियता को कॉरपोरेट्स से आम जनता के बीच भी लाने लगा था। धीरे धीरे वीरेंद्र साब की छवि एक विस्मयकारी मोटिवेटर के रूप में चहुँओर फैलने लगी थी। 

और धीरे धीरे वक़्त के ही साथ ,आख़िरकार वीरेंद्र साब की जिंदगी में वो दिन आ गया, जिसका उन्हें अत्यंत सरगर्मी से इंतेजार था, 
एक बड़ा मंच.....................
हज़ारों लोगों की भीड़ .................................
और मंच पर अकेला................. " वीरेंद्र कुमार"!! 

वीरेंद्र साब को पार्टी प्रचार का जरिया बनाने के लिये और युवाओं का उत्साहवर्धन हेतु, चुनावी दंगल की सरताज, उत्तर प्रदेश की "समाजवादी पार्टी" के संस्थापक एवं नायक "मुलायम सिंह यादव" के पुत्र और उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर "अखिलेश यादव" के लैटर हेड पर छपा "सी. एम हाउस" का न्योता आया था। 

अपने ही गृह राज्य द्वारा इतने बड़े सत्कार की अनुभूति से वीरेंदर साब की रगों में उत्साह का तूफ़ान था लोकल न्यूज़ चैनल, अख़बार, बैनर/होअर्डिंग्स, पैंफ्लेट्स एवं अन्य इत्यादि मीडिया पर वीरेंद्र कुमार के स्पीच के विज्ञापनों की हुंकार से वीरेंद्र और नंदिनी दोनों उत्साहित थे। 

स्पीच का दिन आया, एंट्री/vip पास लिए लोग ऑडिटोरियम में एकत्रित हो चुके थे। इत्तेफ़ाकन उस दिन भी वक़्त दोपहर 2 बजे का था। अपने पब्लिक कांशसनेस वाले फैक्टर के अनुसार " वीरेंद्र कुमार" ने मंच पर 3.15 बजे एंट्री ली , 3000 से ज्यादा की भीड़ की तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल "विरेंद्रमय" हो चूका था। जिंदगी में "पहली" बार इतने बड़े मंच के संचालन की जिम्मेदारी को महसूस कर वीरेंद्र साब काफी अधीर लग रहे थे। 

कार्यक्रम तालिका के अनुसार आम जनता के साथ साथ विशिष्ट शख्सियत जैसे ,
# राष्ट्रस्तरीय ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मनोहर बत्रा, 
# दैनिक भास्कर समूह प्रमुख श्री नरेंद्र अग्रवाल, 
# हिंदुस्तान लीवर प्राइवेट लिमिटेड प्लांट डायरेक्टर श्री अरविन्द शेट्टी 
# बनारस हिन्दू विश्विद्यालय कुलपति श्री सूर्यमणि उपाध्याय 
इत्यादि भी उपस्थित हो चुके थे, 
परंतु ! चीफ गेस्ट एवं कुछ अति विशिष्ट शख्सियतों का आगमन शेष था। 

दीप प्रज्जवलन, पुष्प गुच्छ आदन प्रदान के उपरांत तकरिबन 3.55 पर वीरेंद्र अपना सेशन शुरू करते हैं, जिसकी उन्होंने पिछले 3 महीनो से रात दिन मेहनत की थी, जो की श्रोताओं पर असर भी दिखा रही थी। विषय "मोटिवेशन" पर एक से बढ़कर एक, वाक्यांश, जुमले, तकनिकियां, उदाहरण और अपने अंदाज -ए-पेशकश की रेसिपी से वीरेंद्र कुमार ने महज 35 मिनट में ही श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते हुए उनके बीच अपनी जबरदस्त पकड़ बना ली थी। 

सेशन अपनी लय से आगे बढ़ रहा था, तैयारी के मुताबिक सेशन के एकदम बीच का एक घंटा, वीरेंद्र ने एक ,,,,व्हाक्या के लिए सेट किया था,,,,,,,,,, व्हाक्या,,,,,वीरेंद्र कुमार की जीवनी से ही सम्बंधित था, जिसमे वीरेंद्र अपने संघर्ष की दास्ताँ से श्रोताओं को प्रेरित करने वाले थे। 
इस व्हाक्या की पेशगी के लिए, बिना किसी रुकावट की एक समान लय, पूर्णतः संकेंद्रित अंदाज-ए-बयां और एक सतेज से सन्नाटे की सख्त जरुरत थी, क्योंकि वीरेंद्र कुमार के अनुसार यह व्हाक्या ही उनके पूरे सेशन की "जान" था। 

वक़्त के अनुसार वीरेंद्र अपने ,,,,व्हाक्या की शुरुआत ठीक 4.55 पर करते हैं,,,,,,,,,,,,,,,,, की "दोस्तों",,,,,,,,!,,,,,,,,आज से ठीक 20 साल पहले की बात है,,,,,,,,,,,,!!!,,,,,, (श्रोता भी ध्यानकेंद्रित)........ ..........इतनी पंक्तियाँ शुरू ही होती है की,,,,,,

चीफ गेस्ट का काफिला वहां पहुँचता है,,,,,, जिसमे सबसे पहले ,,,श्री "धर्मेन्द्र यादव (युथ लीडर, समाजवादी पार्टी) ऑडिटोरियम में एंट्री लेते हैं,,,,,,, स्वागत के लिए सभी खड़े हो जाते है,,,,,लोगों का पूरा ध्यान श्री धर्मेन्द्र पर आकर्षित हो जाता है,,,,,शख्सियत को ध्यान में रखते हुए,,,,,वीरेंद्र कुमार भी श्री धर्मेन्द्र का स्वागत करते है, पुष्प गुच्छ आदान प्रदान होता है ,,,,,और इन सब क्रिया कलाप में लगभग कुछ 15 मिनट लग जाते हैं, जिससे वीरेंद्र थोडा "क्रुद्ध" महसूस करते हैं,,,,, श्री धर्मेन्द्र के सीट पर स्थापित होने पर,,,,,,, 

वीरेंद्र ,,,,,,5.20 पर एक बार फिर अपनी पंक्तियाँ दोहराते हुए अपनी लय में वापस आने की कोशिश करते हैं,,,,,, तोह दोस्तों ! आज से ठीक 20 साल पहले की बात है ,,,,,,जब मैं लालगंज के स्कूल से अपने घर लौट रहा,,,,,,,(लालगंज का नाम आते ही तालियों की गड़गड़ाहट होती है),,,,,,,,,घर पहुँचते ही मैं देखता हूँ की,,,,,,,,,,,,,,,,,, (इतनी पंक्तियां होती ही हैं की) ,,,,,,,,,,

अचानक,,,,,,,5.30 पर श्री "नरेश चंद्र उत्तम" (विधायक, समाजवादी पार्टी) , भवन में प्रवेश करते है,,, 
जाहिर था बड़ी शख्सियत थी, तोह स्वागत भी "ज्यादा" जोरदार होना था,,,,,,,, 
फूल माला , 10 मिनट के पार्टी की उन्नति का छोटा भाषण, आदि इत्यादि के बाद उत्तमजी भी सीट ग्रहण करते हैं,,,,, 
वीरेंद्र ,,,,,क्रुद्ध से,,,,,,,,अब हतोत्साहित होने लगे थे,,,,, 
5.30 से 5.55 
5.55 से 6.15 और
6.15 से 6.45 
तक पार्टी की विशिष्ट शख्सियतों के बारी बारी से होते हुए आगमन से ,वीरेंद्र का हौसला पूरी तरह पस्त होने लगता है, 
सेशन में समां बाँधने के लिए जिस लय और ताल की उन्हें सख्त आवश्यकता थी ,वो वीरेंद्र के मुताबिक कहीं पूरी तरह खो जाती है। 
मन की खीज, क्रोध, चिड़चिढ़ेपन्, कुंठा, नैराश्य और डगमगाए हुए हौसले को जैसे तैसे सँभालते हुए विरेंद्र ,,,,,,,,ठीक 6.45 पर एक आखिरी कोशिश करते ही हैं की ,,,,,,,,
अचानक ...................................
श्री रामगोपाल यादव (मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट) की एंट्री होती है, ...........................!
पुष्प माला इत्यादि के साथ साथ , ढोल नगाड़े ऑडिटोरियम की शान्ति भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, यह सब देखते हुए, मुख पर बेहद झूठी हंसी और मन में आक्रोश की सुनामी लिए वीरेंद्र,,,,,,,पूरी तरह निशब्द महसूस करने लगते हैं। 

जो व्हाक्या पूरे सेशन की जान था , और जिसे 4.55 पर शुरू होकर 5.40 तक ख़त्म हो जाना था, 
वो,,,,,,,,,,7.15 तक ख़त्म तोह क्या ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया था। 
इस बात का एहसास वीरेंद्र के दिलो दिमाग पर बुरी तरह प्रहार कर रहा था। 

खुद को महज एक पुतला जैसा प्रतीत कर रहे वीरेंद्र मन ही मन जान चुके थे की , अब उनसे वह व्हाक्या पूरा नहीं किया जा सकेगा, इसलिए उसे अब आगे बढाने की जरुरत नहीं। 
यादवजी के सेटल होते ही , अंततः , माहौल एक बार फिर शांत होता है, 
सारी निगाहें एक बार फिर वीरेंद्र पर, 
! पर इस बार , कालर माइक को धीरे से उतारते हुए , टाई को ढ़ीला करते हुए, और 22 डिग्री में भी पसीने से लथपथ चेहरे को पोंछते हुए , वीरेंद्र नीचे सर किये चुपचाप खड़े रहते हैं। 
मुख मानो सुन्न पड़ गया था। 
मष्तिक विचारों के संकेत भेजना बंद कर चूका था। 
चेहरा सफ़ेद पड़ चूका था। 
जल ग्रहण का ब्रेक काम नहीं आ रहा था। 
निशब्द खड़े वीरेंद्र को सबसे आगे की सीट पर बैठी नंदिनी इशारों से आगे बढ़ने का प्रोत्साहन कर रहीं थीं। जो की किसी काम नहीं आ रहा था। 
लगभग 10 मिनट के इस अंतराल के बाद ,हैण्ड माइक उठाते हुए वीरेंद्र ,कुछ औपचारिक वाक्य कहकर , अचानक , कहते हैं की ,...............................
क्षमा करें , आपका जीवन सुखमय हो, ध्यानवाद। 
बस इतना कहकर , वीरेंद्र फ़ौरन मंच छोड़कर , चले जाते हैं। 
ऑडिटोरियम में बैठा हर शख्स, बस यही सोच रहा था की यह क्या हुआ? 
सभी वी. आई. पी समेत पूरी जनता के आक्रोश का कोई ठिकाना नहीं रहता, 
एक एक करके सभी वी. आई.पी बाहर आते हैं, जहाँ मीडिया का हुजूम उन पर टूट पड़ता है। सभी मीडिया पर वीरेंद्र कुमार की कड़ी आलोचना करते है, ..............
उधर, अंदर बैठी जनता, टिकट और पास के पैसे फिजूल होने के आक्रोश से पूरा ऑडिटोरियम तहस नहस कर देती है। 
गुस्से से तिलमिलाए धर्मेन्द्र, वीरेंद्र को सबक सिखाने के उद्देश्य से रेस्ट रूम की ओर अग्रसर होते हैं, रूम में पहुँचते ही ,वीरेंद्र की कालर पकड़कर धर्मेन्द्र चेतावनी देते हैं वो अब प्रदेश में कभी शो नहीँ कर पाएंगे। फ़ोन पर उत्तमजी ,धर्मेन्द्र को हिदायत देते हैं , अपने गुस्से पर काबू रखें, यह विपक्षी पार्टी के लिए सियासी मुद्दा बन सकता, वीरेंद्र हमारे राज्य का मूल निवासी है ,उसे छोड़ दो। 
वीरेंद्र भी हाँथ जोड़कर माफ़ी मांगते है। 

स्थल से फ़ौरन वीरेंद्र , नंदिनी के साथ गाडी में बैठकर निकल जाते हैं। स्तब्ध नंदिनी ,वीरेंद्र का ढांढस बांधती हैं, और ड्राईवर को जगजीत सिंह की गजल लगाने को कहती हैं। 

नंदिनी का हाँथ पकड़ते ही , वीरेंद्र अपने अश्रुओं के सैलाब को रोक नहीं पाते। 

2 दिन बाद, कंपनी में अपने चैम्बर में पहुंचकर, वीरेंद्र सामने लगी घडी को देखकर, और अब तक का फ्लैशबैक याद करते हुए , सोचते हैं, की किस तरह कॉर्पोरेट के पढ़े लिखे लोगों को मैं इंतेजार कराता रहा। 

मैंने टाइम मैनजमेंट पर न जाने "वक़्त" विषय पर कितनी क्लासें ली , 
पर आज वक़्त की एक "क्लास" 
ने मेरी सोच, और आत्मा को झकझोर कर रख दिया। 

वीरेंद्र अपने आगे के हर सेशन को "वक़्त" पर ख़त्म करने की सौगंध लेते हैं। 




विकास पाण्डेय (२४/०९/२०१६)

Monday, September 12, 2016

भ्रम; Myth

भोपाल में होशंगाबाद हाईवे पर स्थित साकेत नगर के 9B सेक्टर के मकान नं 167 के मालिक 57 वर्षीय "नारायण विष्णु दशपुत्रे" का घर तड़के सुबह के 4 बजे , आरती की घंटियों से सराबोर हो उठता। 

श्रीमद् भगवद् गीता, बजरंग बांड, महाभारत, रामायण, कैवल्य उपनिषद, प्रकाष्ठ योगसंहिता और "गीता प्रेस" गोरखपुर (उ.प्र) से प्रकाशित ऐसे कई महान् ग्रंथों का शुद्ध संस्कृत में सम्पूर्ण कंठस्त ज्ञान रखने वाले और , मध्य प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में बतौर चीफ इंजीनियर के पद पर कार्यरत "दशपुत्रेजी" अपने आप को ब्रम्हत्व जीवन शैली का स्वामी और प्रकांड विद्वान् मानते थे।

साकेत नगर के बिल्कुल समीप लगे भोपाल के दो सुप्रसिद्ध शिक्षण संस्थान "बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय" और "ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (एम्स)" के स्थित होने की वजह से साकेत नगर के सभी सेक्टर्स के 90 फीसदी से ज्यादा घरों में इन शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थी किराये से रहते थे, जिस वजह से पूरा साकेत नगर विद्यार्थिमय् रहता।

साकेत नगर के सभी स्थानीय लोगों की तरह, दशपुत्रेजी ने भी अपने 2000 वर्गफुट के घर के 3 कमरों को किराये पर दे रखा था, जिसमे ऊपर के 3 कमरों में , आदित्यनाथ शुक्ला (एम्स में एंडोक्रिनोलॉजि में एम डी के छात्र), शिवाकांत उपाध्याय (बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग में बी ई के सातवें सेमेस्टर के छात्र), विवेक झा (रीजनल रिसर्च लैबोरेट्री, आर आर एल, में जूनियर साइंटिस्ट) रहते थे।

निः संतान दंपति के रूप में दशपुत्रेजी और उनकी धर्मपत्नी शीला जो की केंद्रीय विद्यालया की प्राचार्या थी , ईश्वर की आराधना करते हुए अपना जीवन यापन कर रहे थे। हाई डायबिटीज के मरीज दशपुत्रेजी पूजा पाठ में इस कदर लीन रहते की प्रसाद के रूप में पूड़ी, हलवा घी इत्यादि के जबरदस्त सेवन की वजह से उन्हें टेबलेट्स की बजाय इन्सुलिन पर रहना पड़ रहा था। शीलाजी और आदित्यनाथ के लाख समझाने के बावजूद दशपुत्रेजी अपनी जिद पर अड़े रहते हुए उन्हें उलटी समझाइश देते की , सब प्रभु की माया है, मुझे वोही रोगमुक्त करेंगे।
आदित्यनाथ , वक़्त-वक़्त पर दशपुत्रेजी की डायबिटीज का एम्स में चेकअप करवाकर शुगर रीडिंग्स और इंसुलिन इंजेक्शन का मैनेजमेंट करते रहते।

9बी सेक्टर के बीचों बीच स्थित "मिश्रा मेस" साकेत नगर में रह रहे समस्त विद्यार्थियों के लिए भोजन का एकमात्र और सबसे सशक्त जरिया थी। मेस में काम कर रहे सभी लड़कों में से 16 वर्षीय "राकेश कुमार" जो की बिहार के "भागलपुर" जिले से काम की तलाश में भोपाल आया था , 9बी सेक्टर के सभी विद्यार्थियों में सबसे लोकप्रिय था।
मिश्राजी की एवन साइकिल पर 20 से अधिक टिफिन को लादकर समय से पहले सब तक पहुँचाने की तूफानी गति ही राकेश कुमार की लोकप्रियता का कारण थी, जिसकी वजह से सभी लोग राकेश कुमार को "राकेट" के नाम से जानते व् पुकारते थे।
राकेट की मेस में छुट्टी का दिन ,मिश्राजी और सभी  विद्यार्थियों पर जबरदस्त रूप से भारी पड़ता था।

दशपुत्रेजी के यहाँ रह रहे तीनों किरायेदारों की भूख भी बाकियों की तरह काफी हद तक रॉकेट पर निर्भर थी। पढाई की जबरदस्त जिज्ञासा रखने वाला राकेट , आदित्यनाथ भैया से मेडिकल के छोटे मोटे गुण सीखता , जैसे फर्स्ट ऐड वगेरह, आदित्यनाथ जब जब  दशपुत्रेजी के इन्सुलिन का डोज़ सेट करते तब तब बड़ी लालसा से राकेट,  भैया से उस बड़े से इंजेक्शन के बारे में पूछता। आदित्यनाथ, राकेट को डायबिटीज सम्बंधी मूल जानकारियां देते रहते।

जहाँ एक तरफ छोटी जात का होने की वजह से राकेट ,दशपुत्रेजी को फूटी आँख न भाता था, तोह वहीँ दूसरी ओर राकेट वक़्त वक़्त पर मौका मिलते ही दशपुत्रेजी की पूजन सामग्री, निदान संबंधी टोटके, व्रत फलाहार, त्यौहार दिवस इत्यादि में सुसज्जित स्वादिष्ट प्रसाद एवं महंगी चढोत्री पर मौज उड़ाता रहता। जिस वजह से दशपुत्रेजी का आक्रोश राकेट को देखते ही सातवें आसमान पर आ जाता। दशपुत्रेजी ने तीनो किरायेदारों को सख्त निर्देश देकर, राकेट की टिफिन पहुचाने की टाइमिंग इस कदर सेट की थी की राकेट उनके सामने न आये, क्योंकि उनका मानना था की उसे देखते ही उनका दिन अशुभ और पूजा पाठ भंग हो जाएगी।
रोजाना 167 में टिफिन पहुँचाने की वजह से राकेट, दशपुत्रेजी की दैनिक दिनचर्या की समय सारणी से बेहद अच्छी तरह वाकिफ था। जिसमे :-
सोमवार को जब दशपुत्रेजी भोलेनाथ के दर्शन कर भोजपुर से लौटते, तोह उनके ऑफिस जाने के बाद राकेट शीला आंटी से आग्रह कर प्रसाद जिसमे दूध, दही घी मेवे इत्यादि ले जाता। और बड़े मजे से सेवन करता।
मंगल को यही प्रक्रिया, टी टी नगर स्थित बजरंग बली की पूजा अर्चना के प्रसाद जिसमे राकेट के मनपसंद "खोवे के पेड़े", रहते,,, मिल जाते।
बुध और गुरु को साईनाथ का विशेष प्रसाद, शुद्ध घी से निर्मित मगज के लड्डू।
शनिवार को राकेट का ब्रेक क्योंकि उसमे तिल और तेल रहता।
पर रोजाना इतवार की शाम 7.30 बजे की 9बी सेक्टर और आर.आर.एल के बीचों बीच स्थित गणेश मंदिर की आरती के उपरांत प्रसाद वितरण में स्वादिष्ट मोदक, राकेट को इसलिए मिल जाते क्योंकि ठीक 8 बजे दशपुत्रेजी की मंदिर से और राकेट की टिफिन बांटकर लौटने की टाइमिंग एक दम मेल खाती। 

गनेश मन्दिर से दशपुत्रेजी के घर का रास्ता काफी सुनसान रहता , वे रोजाना चहल कदमी करते हुए मन्दिर आरती के लिए जाते थे।
दबे पाँव पीछा करता राकेट, इस बात बेहद ख्याल रखता की दशपुत्रेजी उसे देख न लें, क्योंकि राकेट को अच्छी तरह याद रहता की 2 वर्ष पहले जब दशपुत्रेजी न घर की नजर उतरने हेतु टोटका करके घर के आगे की सड़क में टोटका सामग्री में मटका जिसमे नारियल, निम्बू, कुछ पैसे इत्यादि ऐसे व्यक्ति के उपयोग हेतु रखे थे, जिसका प्रवेश घर में न हो , पर थोड़ी ही देर में सामने से आ रहे राकेट ने बड़े मजे से मटके को उठाकर घर लेजाकर नारियल खा लिया और निम्बू का शरबत बनाकर पी लिया था । जिसके उपरांत दशपुत्रेजी ने राकेट की बेंत से जोरदार पिटाई की थी।

अपनी गति से गतिवान समय आगे बढ़ते हुए , भोपाल सहित मध्य प्रदेश पर चुनाव के बादल लेकर आया, बीजेपी की सरकार की सशक्त गूँज चारों ओर पुरजोर थीं, शीलाजी को भी चुनाव ड्यूटी पर देर रात तक संलग्न होना पड़ता।
पिछले कई दिनों की तरह, शीलाजी इ वी एम मशीन की लॉग एंट्री कर रहीं थीं, की अचानक उनके फ़ोन की घण्टी बज पड़ी !!!!!

फ़ोन पर आदित्यनाथ उन्हें सूचना देता है की , अंकलजी (दशपुत्रेजी) एम्स के विंग क्रमांक 3 के icu में एडमिट हैं, कृपया जल्दी पहुंचे।
असीम चिंताओं से भरी शीलाजी तूफानी गति से अस्पताल पहुंचकर देखतीं हैं की, icu के बाहर शिवानंद, विवेक, पडोसी त्रिपाठीजी, मिसिज़ शर्मा बैठे हैं, अंदर पहुंचकर वह देखतीं हैं की दशपुत्रेजी के बेड क पास सीनियर डॉक्टर चौधरी, आदित्यनाथ से चर्चा कर रहे हैं, चौधरी साब के जाते ही आदित्यनाथ , शीलाजी को दशपुत्रेजी की मेडिकल कंडीशन्स का विवरण देते हुए बताते हैं ,
अंकलजी ने जल्द बाजी में इन्सुलिन का गलत डोज़ सेट कर लिया था, जिसकी वजह से शाम को गणेश मंदिर से लौटते वक़्त उनकी शुगर 40 पहुँच गयी थी और वह अचानक मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े थे, जिस वजह से उनके सर पर गम्भिर चोटें आयीं हैं, ct स्कैन की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा चिंता की बात नहीं है।
आदित्यनाथ बताते हैं ,ऐसी स्थिति में अगर जल्द ही पेशेंट को फर्स्ट ऐड के रूप में शुगर न दी जाये तोह ,कार्डिएक अरेस्ट या पैरालिसिस जैसे गम्भीर परिणाम सामने आ सकते हैं। पर शुक्र है की अंकलजी को फर्स्ट ऐड समय पर मिल गया था।
अगली सुबह, स्थिति सामान्य होने के बाद जब दशपुत्रेजी अपने इर्द गिर्द सभी को देखकर मुस्कुराते हुए , आदित्यनाथ का शुक्रिया अदा करते ही हैं की अचानक आदित्यनाथ उन्हें बीच में रोककर बताते हैं की , अंकलजी !
अगर आपको शुक्रियादा करना ही है तोह हम में किसी का नहीं बल्कि "राकेट" का कीजिये , शीलाजी भी स्तब्ध निगाहों से आदित्यनाथ को देखते हुए सुनती हैं,
आदित्यनाथ बताते है। , जब कल रात आप गणेश मंदिर के समीप गिर पड़े थे , तोह मोदक की लालसा में हमेशा की तरह रॉकेट आपका पीछा कर रहा था, आपको ज़मीन पर पड़े देख और मेरी द्वारा आपकी डायबिटीज की जानकारी को ध्यान में रख राकेट समझ गया था की आपकी शुगर लो हो गयी है, उसने फौरन आप ही की थैली से मिठाई खिलाने की कोशिश की मगर , मुख अकड़ने की वजह से मिठाई अन्दर नहीं जा रही थी ,फिर उसने फ़ौरन मंदिर से मिश्री लेकर पानी के गिलास में घोलकर आपको पिलाया, जिससे आपकी शुगर नार्मल आने लगी पर सर की चोट की वजह से आपको होश नहीं आ रहा था।
रास्ता सुनसान और मोबाइल के अभाव की वजह से वह किसी से संपर्क नहीं कर पा रहा था, इतने में राकेट के मेस का साथी गुड्डू वहां से गुजर रहा था, जिसे राकेट ने फ़ौरन हाईवे से सटे फुटपाथ पर खड़े ऑटो को बुलाकर , और आपको उसमे बिठाकर सीधा यहाँ मेरे पास ले आया।
राकेट की अस्पताल देखने की तीव्र इक्षा को देखते हुए , एक बार मैंने उसे यहाँ अपना सेंटर दिखाया था।
इस तरह आप एक जबरदस्त खतरे से बहार आये हैं , अंकल।
आदित्यनाथ की बातोँ को सुन दशपुत्रेजी स्तब्ध रह गए, दो तीन के डिस्चार्ज के बाद घर लौटते वक़्त कार में , पिछले कुछ सालों के फ्लैशबैक को याद कर , दशपुत्रेजी की आखों से अश्रु नहीं रुक रहे थे, वे सोच रहे थे ,
की जिस मूर्ती में ईश्वर को खोजते हुए , अगम्य प्रसादों का भोग लगाकर में चमत्कार ढूंढ रहा था।
वही ईश्वर राकेट के रूप में मेरे पास ही था, जिसे में देख न सका। जिसके प्रसाद के सेवन से मैं आक्रोशित होता रहा , वही ईश्वर छुपकर प्रसाद चुराकर ,मुझ पर परोपकार करता रहा।
दशपुत्रेजी का "भ्रम" सदैव के लिए समाप्त हो रहा था,
 उनके न रहने पर शीला की चिंता को ध्यान में रखते हुए , और सभी प्रसाद रुपी गरिष्ठ सामग्री के सेवन से परहेज की सौगंध लेते हुए , दशपुत्रेजी सीधे घर की बजाय मिश्रा मेस पहुँचते हैं।
जहां राकेट टिफिनों को भरने में मशगूल था, राकेट को गले से लगाते हुए दशपुत्रेजी ,मिश्राजी को कहते हैं अबसे राकेट की पढाई और रहन सहन का खर्च अब वही उठाएंगे।
कहते हुए दशपुत्रेजी ,राकेट को मोदक और मगज के लड्डुओं से भरे पैकेट देकर लौट जाते हैं


विकास पाण्डेय (१३/०९/२०१६)

Wednesday, August 31, 2016

प्रैक्टिकल; practical


सन् 2009

"3 इडियट्स" , भोपाल की राज टॉकीज़ में देखकर , "बी. फार्मा" के पांचवे सेमेस्टर का छात्र "सत्या" बाहर निकला। कॉलेज की क्लासों और लैबों में प्रॅक्टिकल्स के दौरान शिक्षकों और संभंधित विषयों का असर भले ही सत्या पर भित्ते भर न हुआ था, पर फ़िल्म में "आमिर" के किरदार और फ़िल्म का "मेसेज" सत्या की रगों में उतरने जा रहा था।

फ़िल्म में दिए गए मेसेज "की मनपसंद और स्वनिशीथता देने वाली क्रिया को जज्बे का रूप देते हुए कैरियर बनाये", के चिंतन में डूबा सत्या "छिंदवाड़ा" से भोपाल न सिर्फ डिग्री बल्कि अपने पूरे परिवार का सपना पूरा करने आया था।

मध्यमवर्गीय सत्या के परिवार के मुखिया "पिताजी" की सारी उम्मीदें सत्या पर इसलिए पुरजोर थीं, क्योंकि उन्हें यह पूरा विश्वास था की सत्या जल्द ही डिग्री ख़त्म करके , किसी अच्छी नौकरी हासिल कर परिवार में अपनी दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी उठाने में उनकी मदद करेगा।

सत्या के बचपन का मित्र और वर्तमान बैचमेट अरविन्द उसे फ़ोन पर कॉलेज की समस्त गतिवान गतिविधियों से अवगत कराते हुए यह बताता है की वर्तमान सेमेस्टर तेजी से अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, जिसमे की सत्या की अब तक की शून्य प्रतिशत उपस्थिति की वजह से शायद उसे परीक्षा फॉर्म भरने नहीं दिया जाएगा। अतः उसका सभी क्लासेज और प्रॅक्टिकल्स में उपस्थित होना बेहद अनिवार्य हो गया है।
अरविन्द की सूचना और पिताजी के आक्रोशित चेहरे की छवि उकेरे सत्या अगली ही सुबह , अपने विचार, मंथन और कल्पनाओ को बैग में लादते हुए कॉलेज पहुँचता है।

लैब में पहुँचते ही , सत्या की पिछले सेमेस्टरों की उपस्थिति एवं बेहतरीन प्रदर्शन की तुलना में वर्तमान सेमेस्टर में आये अचानक जबरदस्त गिरावट को ध्यान में रखते हुए सत्या के सभी सहपाठी और सेमेस्टर के फार्मसूटिक्स के शिक्षक सत्या को स्तब्ध निगाहों से देखते हैं।

कुछ देर की समझाइश के बाद प्रैक्टिकल शुरू होते ही, सत्या के कानों में प्रैक्टिकल सम्बंधित प्रश्न पड़ता है , की "पेरासिटामोल" ड्रग (दवा) की "सोल्युबिलिटी" (घुलनशीलता) निकाल कर लाओ?।

फिल्मों की खुमारी सत्या पर इस कदर छाई रहती की शिक्षक द्वारा पुछा गया प्रश्न उसे फ़िल्म "कोई मिल गया" के एलियन द्वारा भेजे गए कोडवर्ड सा प्रतीत होता।
और फलस्वरूप ड्रग की सोल्युबिलिटी वह तब निकाल पाता जब उसे सोल्युबिलिटी शब्द का मतलब मालूम होता।
कुछ ही देर में , लैब से बाहर निकाले जाने पर सत्या वापस अपने चिंतन में डूब जाता ।

जहाँ एक तरफ लैबों और क्लासों से बाहर निकाले जाने का सिलसिला सत्या पर गहरा असर डाल रहा था वहीँ दूसरी ओर फिल्मों की काल्पनिक दुनिया की तरफ सत्या का रुझान बढ़ता ही जा रहा था।

3 इडियट्स के मेसेज को ठीक से समझने के लिए सत्या बार बार वह फ़िल्म देखता, भोपाल में रूम और मेस के खर्चों के साथ साथ टिकटों का बोझ घर से पिताजी द्वारा भेजे हुए सीमित पैसों पर भारी पड़ता जोकि सत्या को अपनी कोर्स की कुछ महत्वपूर्ण किताबों को बेचने तक मजबूर कर देता।

जब जब अरविन्द सत्या से परीक्षाओं में आने वाले विषय संबंधी प्रश्न पूछता, तब तब सत्या फ़िल्म के मैसेज को दोहराते हुए खुद से सवाल जवाब करता, "की मैं वहीँ करूँगा जो मुझे अच्छा लगता है, मुझे ख़ुशी देता है, आखिर वह है क्या??

सवालों के समुद्र में गोते लगाते हुए सत्या कई सवाल खुद से करता जैसे :-
1. मुझे फ़िल्म देखना बहुत पसंद है, पर फ़िल्म देख देखके कैरियर बन सकता है क्या, नहीं नहीं !!
2. मुझे सोना बहुत पसंद , पर सोके कैरियर , नहीं!!
3. क्रिकेट बहुत पसंद है, पर विक्रम भैया 10 सालों से संघर्ष कर रहे हैं , नहीं इसमें भी मजा नहीं!!
गेम खेलना, दोस्त बनाना वगेरह जैसे अन्यागिनत सवालों की कड़ी अचानक तब टूटी , जब उसे ख्याल आया की मुझे सुपरबाइक्स चलाना बहुत पसंद है , और आजकल बाइक मॉडिफिकेशन का चलन भी जोरों पर है । इस क्षेत्र में मैं जरूर कुछ कर सकता हूँ , और इस कुछ का जवाब खोजने की लालसा ने सत्या के दिलो दिमाग में तूफ़ान पैदा कर दिया।

बस अपने इस जुनून और अरविन्द की पैशन प्लस (जिसमे 20 का पेट्रोल डला था) की थाकी चाबी लेते हुए और 3 इडियट्स का सुप्रसिद्ध गाना
"सारी उम्र हम मर मर के जी लिए"
रस्ते भर गाते हुए सत्या पुराने भोपाल में मोती मस्जिद के पास स्थित वसीम भाईजान के "रेंजर गेराज" में काम सीखने पहुँच गया।

वसीम भाई के बाइक मॉडिफिकेशन के चट्टानी तजुर्बे के सामने "हार्ले डेविडसन" के चीफ ऑटोमोबाइल engineers भी फेल थे।

सत्या से रूबरू मुखातिब और उसके हुलिये को टटोलते हुए भाईजान हिदायत दी की जिन हाथों में कॉपी और किताब होनी चाहिए ,उनमे पाना और पिंचिस शोभा नहीं देंगे, अतः वो वापस चला जाए।

लेकिन सत्या कहाँ मानने वाला था, और कई दिनों की मशक्कत और सत्या की जिद के सामने आख़िरकार भाईजान को मजबूर होकर उसे 2000 रु मासिक का काम देना पड़ा।

अपनी गति से गतिवान समय आगे बढ़ता रहा, एक तरफ लैबों में बीकरों की खन ख़न होती रही और दूसरी तरफ नटों और बोल्डरों की टन टन चलती रही। पाँचवे सेमेस्टर तक की जमा फीस, नाम के आगे डिग्री, और पिताजी का भय सत्या को मजबूरन कॉलेज खींच खींच कर लाता रहा ।

दैनिक दिनचर्या में सुबह के 10 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक कॉलेज और 6 बजे से लेकर रात के 11.30 बजे तक गेराज का काम सत्या की सेहत पर धीमा जहर घोलना शुरू कर रहा था।

तेज पर दिशाहीन बुद्धि के चलते , कभी ग्रेस, कभी सैम बैक और कभी सब्जेक्ट बैक जैसे परिणामों के साथ सत्या जैसे तैसे आठवें सेमेस्टर तक पहुँच गया।

तकरीबन 13 महीनो तक गेराज में कड़ी मशक्कत करने के बाद कोई सफलता न मिलने पर, और स्वास्थ्य पर गम्भीर असर होने की वजह से सत्या को काम छोड़ना पड़ा।

सन् 2012
आख़िरकार वो दिन आया जिसका हर छात्र को इंतज़ार रहता है, जिंदगी की पहली डिग्री का हाथों में होंना। सभी सहपाठियों की तरह अरविन्द ने भी अपने लिये भविष्य की तैयारियां रखी थीं। उसने अपने मित्र सत्या को बताया की प्रधान मंत्री छात्रवृति योजना के तहत उसने छंदबद्ध परीक्षा पास कर ली है और अब आगे की पढ़ाई के लिए वह "बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय" जा रहा है। अपने मित्र जिसने अभी तक सत्या का हर कदम साथ दिया , से बिछड़ते हुए सत्या के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट रहा था।

13 महीनो का गेराज का अपशिष्ट अनुभव
पिताजी की प्रकोपि उम्मीदें
और
बी.फार्मा की डिग्री के मूलतत्व ज्ञान का सिद्धहस्त अभाव। सत्या को न ही सिर्फ आगे पढ़ने के लिए रोक रहा था बल्कि किसी रोजगार को तलाशने के लिए बलपूर्वक विवश भी कर रहा था।

सेकंड डिवीजन की डिग्री हांथों में लिए सत्या फार्मा के हर क्षेत्र में नौकरी के लिए प्रयास करता है। मार्केटिंग, प्रोडक्शन वगेरह मैं कार्यरत सीनियर्स की सिफारिशें भी नाकाम रहती।

आख़िरकार थक हारकर , सत्या अपने दूर मौसाजी जो की भोपाल में ",अखिल भारतीय तकनिकी शिक्षा संस्थान" में सीनियर सुपरिन्टेंडेंट के पद पर कार्यरत थे के घर अपनी उम्मीदों के साथ पहुँचता है।

सत्या की तीक्ष्ण जिज्ञासा और भावनाओ को देखते हुए वे अपने करीबी मित्र "अशोक" जो की मंडीदीप स्थित "लुपिन फार्मास्युटिकल्स" में बतौर "क्वालिटी कण्ट्रोल मैनेजर के रूप में कार्य कर रहे थे, को फ़ोन करके सत्या की जॉइनिंग के प्रबंध का आग्रह करते हैं।

औपचारिक इंटरव्यू में बेहद ख़राब प्रदर्शन के बावजूद अशोक सत्या की जॉइनिंग क्वालिटी कण्ट्रोल विभाग में ट्रेनी के रूप में सत्या के मौसाजी को यह संकेत देते हुए करवाते हैं की अब यहाँ से सत्या की मेहनत और उसका प्रदर्शन ही उसे आगे ले जा सकेगा। अगर सत्या अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका तोह कंपनी की पॉलिसीस को मद्देनज़र रखते हुए वह भी कुछ नहीं कर सकेंगे।

कंपनी के विभिन्न विभागों में एक महीने के इंडक्शन प्रोग्राम के उपरांत , सत्या qc विभाग में अपने पहले दिन की शुरुआत करता है। और पहले ही दिन qc विभाग के सीनियर एनालिस्ट "प्रदीप" संजोगवष सत्या को वही सवाल जड़ देते हैं , जो उससे 2 साल पहले फार्मसूटिक्स के शिक्षक ने कॉलेज की लैब में पूछा था।

मिस्टर सत्या अपनी कंपनी में बनने वाली (methergine)टेबलेट्स का बैच तैयार हो रहा है, इसकी क्वालिटी को सुनिश्ति करने के लिये रैंडमली चुने गए सैंपल्स के परिक्षण हेतु पैरामीटर्स जैसे सोल्युबिलिटी , वेट वेरिएशन ड्रग प्रोफाइल वगरैह रिपोर्ट्स निकालकर मुझे आज दोपहर 2.00 बजे तक जमा कीजिये। ,,,,,,,

हुआ वही जिसका सवाल सुनते ही सत्या को डर था। दोपहर से रात के 2.00 बज गए पर रिपोर्ट का कोई अता पता न चला I

बीतते समय के साथ, सत्या की अन्यागिनत गलतियों और लापरवाहियों को प्रदीप की कम्प्लेंट्स हवा देती रहीं, जांच परिक्षण हेतु इंस्ट्रूमेंट्स से लदे क्वालिटी कंट्रोल के चैम्बर में सत्या की 9 घंटे की एक एक शिफ्ट एक एक साल की तरह बीत रही थी ।
सौंपा गया हर एक कार्य , सत्या का जीना दूभर कर रहा था।

आख़िरकार पहाड़ जैसा महीना बीतने के बाद , अशोक ,सत्या के मौसाजी को इत्तला करते हुए ,सत्या को मजबूरन उसका टर्मिनेशन लैटर हांथों में थमा देते हैं ।

पिछले 2 सालों में बीते वक़्त का फ्लैशबैक याद करते हुए दुखी सत्या , रूम पहुंचता ही है की , फ़ोन की घंटी पर बनारस से अरविन्द सत्या को याद करता है। बहते हुए अश्रुओं के साथ सत्या अरविन्द को कंपनी में बीते अनुभवों को बताते हुए ,यह कहता है की.......

अध्ययनकाल के दौरान पनपते बारूदी कैरियर को उसने खुद ही अपनी फ़िज़ूल की महत्वकांषाओं की चिंगारी से जलाकर राख कर दिया है।

3 इडियट्स तोह सन् 2009 में आई थी , पर उसके मैसेज को तोह उसने सन् 2007 में अपना पसंदीदा पाठ्यक्रम "बी.फार्मा" चुनकर कार्यान्वित किया था।

माता पिता को फ़ोन और घर पर और कॉलेज के शिक्षकों को लैबों और क्लासों में प्रॅक्टिकल्स/क्लासेज के दौरान , सत्या अपने झूठ और छलावे की अठखेलियां दिखाकर स्वैर कल्पनाओं की सवारी तोह करता रहा।

पर असल ज़िन्दगी के महज एक प्रैक्टिकल ने उसकी सोच और आत्मा को झकझोर कर रख दिया।

क्वालिटी कंट्रोल विषय संभंधित की जी तोड़ पढ़ाई कर, सत्या , वापस कंपनी में नौकरी पाने की सौगंध लेता है।


विकास पाण्डेय (३१/०८/२०१६)

Saturday, August 20, 2016

पहचान (हास्यमेव जयते) : pehchaan (hasyamev jayte)


'काय बड्डे', की गूँज से सराबोर बड्डापुर जिले का बडवानी इलाका पौ फटने से लेकर रात होने तक बड्डामय रहता।
सावन के आखिरी सोमवार की तड़के सुबह , रग रग में बहने वाले और हमेशा बहार आने को आतुर अपने "तकिये कलाम" को लिए बड्डों के बड्डे ,,,"बड्डन भैया" की तेजस्वी आँखें बडवानी में खुल पड़ीं।
विशालकाय कालिभुजंग कद काठी वाले बड्डन भैया, दातून फसाए और रस्ते में अन्यागिनत बार बड्डा जयराम करते हुए घोंघा नदी के ज्वाला तट पर स्नान हेतु पहुँचते ही मन ही मन नदी को अपना तकिया कलाम सुनाते हुए कूद पड़े।
स्नानोपरांत, उँगलियों में आधा दर्जन अंगूठियां और गले में सोने की सांकल (जिसकी किशतें बड्डन भैया को सताती रहती) पहने बड्डन भैया माथे पर भगवा तिलक और सफ़ेद कमीज पर भगवा गमछा (जिसे गूगल मैप में सॅटॅलाइट व्यू से भी देखा जा सकता था) डालकर बडवानी में स्थित सुप्रसिद्ध होटल "एक नं भैया" पोहा-जलेबी खाने पहुंचे।
""""इससे पहले की तकिया कलाम मुख से बहार आता, होटल के नौकर पुत्तन ने 5 प्लेट पोहा और आधा किलो जलेबी बड्डन भैया के सामने रख उन्हें शांत किया।
नाश्ता कर बड्डन भैया , अपनी बुलेट गाड़ी जिसके कलपुर्जों की सुनहरे रंग से कोटिंग की गयी थी पर सवार , जंभूरि चौक स्थित अपनी दूकान के लिए निकले,
रास्ते में "रावण कार ड्राइविंग स्कूल" की "ठोक्दो k10" में ड्राइविंग सीख रही मिसिज़ कालापानी से धोखे से बड्डन भैया की बुलेट छु गयी,
और बस आख़िरकार सुबह से अंदर ही अंदर कुलबुलाता बड्डन भैया का तकिया कलाम हुंकार भरता, आसमान में गर्जना करता हुआ , किसी एसिड की बारिश की तरह दोनों पर बरस पड़ा,,,,,,,,,
"""""ए ए ए एई ई ई ......."तुम लोग जानते नहीं मैं कौन हूँ"।
गर्जना से मिसिज़ कालापानी के कान इस कदर सुन्न पड़ गए थे मानो किसी ने कान में रस्सी बम फोड़ दिया हो।
बगल में बैठा ड्राइविंग स्कूल का ट्रेनर "घंटियाल" बड्डन को जनता तोह नहीं तोह नहीं था पर उनके ड्रेस कोड से किसी पार्टी से संभंधित होने का अनुमान लगाते हुए , बड्डन भैया से माफ़ी मांगने लगा। उसकी बिनती को देखते हुए जटा रुपी मूछों को फेरते हुए बड्डन ने मांफ किया और दुकान के लिए आगे बढे।

जंभूरि चौक स्थित बड्डन की दुकान पर उनका DJ और भंडारा आयोजन का व्यवसाय था। दुकान पहुंचने तक रास्ते भर कई मर्तबा तकिया कलाम बाहर आने को आतुर रहा लेकिन, सावन सोमवार की समाप्ति पर कावड़ियों के सैलाब के लिए और नागरिक भ्रष्टाचार मंत्री "श्री बाबू कतरी" के नगर आगमन के दौरान भंडारे और DJ की व्यवस्था के तनाव की वजह से वे खुद पर काबू किये रहे।
कुछ ही घंटों बाद ,विशाल कावंड यात्रा के कावड़िये जंभूरि चौक पहुंचे , उनकी संख्या इतनी प्रबल थी मानो, स्वयं घोंघा नदी सड़क पर उतर आयीं हो। बड्डन भैया और उनके सवा तीन दर्जन चेलों की पुरजोर तैयारी में पसंदीदा गाना "भोले तोह हो गए टनाटन" सुनते हुए और स्वल्पाहार करते हुए कावड़िये आगे अपने गंतव्य की और बढ़ लिए। बड्डन भैया का ख़ास चेला "जहर" ने बताया की कुछ लोग स्वल्पाहार की बुराई कर रहे थे , पर आपसे कुछ नहीं कहा, घमंडी हंसी का भाव लाते हुए और अपना तकिया कलाम जड़ते हुए बड्डन बोल पड़े "किसी की हिम्मत है" ???।
अचानक मोबाइल की रिंगटोन "भोला नई माने रे" बजी , और बड्डन को खबर आई की माँ की तबियत बहुत ख़राब लग रही है, शाम को मंत्री जी के आगमन की तैयारियां की चिंता सोचते हुए , बड्डन ने जहर को माँ को सुप्रसिद्ध व्यापम कांडी डॉक्टर "चूना वाला" को दिखाने के लिये भेजा और ये भी हिदायत दी की डॉक्टर को बता देना की यह "किसकी" माँ हैं।
मंत्रीजी के मंच साज सज्जा की तैयारियों में जुटे बड्डन के सामने सड़क पर, किसी फिदायीन रुपी गमछा लपेटे अपनी ए वी एस "चूंटी" पर आ रही लड़की को खाज "अल्सर" पर सवार लड़के ने टक्कर मर दी थी। लड़की को बचाने पास खड़े "स्पाइडरमैन, सुपरमैन, बैटमैन और आयरन मैन" लड़के को सबक सिखाने पहुँच चुके थे, पहले कौन बचाएगा की कोलाहल में सभी सुपर हिरोज आपस में "तू जानता नहीं मैं कौन हूँ", "तू नहीं जानता की मैं कौन हूँ" की गूँज से बाजा फाड़ रहे थे।
पास खड़े तमाशा देख रहे बड्डन के कानों में अचानक , खुदका सर्वाधिकार समझने वाले तकिया कलाम की गूँज पड़ी, जिसे सुनते ही बड्डन की रगों में बह रहे आरबीसी, w बीसी और प्लेटलेट्स में उबाल आ गया जिसके फलस्वरूप "हल्क" का रूप ले चुके बड्डन और उनके चेलों ने स्पाइडर और सुपर तोह क्या किसी को मैन कहलाने लायक भी नहीं छोड़ा।

.....शाम को मंत्रीजी को दूर से देखते ही बड्डन को फ्लैशबैक में याद आया की कैसे उन्होंने एक बार बीहड़ में पंचर हुई मंत्रीजी (जोकि पहले विधायक थे) की गाडी का पंचर बनाया था, जिस प्रतिभा को देख मंत्रीजी ने बड्डन को पार्टी के लड़कों से जुड़ने कहा था, और जिसके उपरांत बड्डापुर में लगे पार्टी प्रचार के बड़े बड़े हॉर्डिंग्स में मुख्य कार्यकर्ता जैसे "डोगा", "भोकाल" "पनियल" और न जाने कितनो के नीचे दबी हुई अपनी 2x2 की फ़ोटो देख बड्डन आज भी खुद को मन ही मन "विधायक" मानते हैं।
उधर जहर के फ़ोन पे फ़ोन बड्डन को अस्पताल की ओर खींच रहे, पर मंत्री जी से मिले बगैर बड्डन का वहां से निकलना संभव न था, आख़िरकार सभा समाप्ति के बाद और मंत्रीजी के बड्डन की ओर एक बार भी न देखने पर निराश बड्डन किसी धूमकेतु की गति से अस्पताल की और भागे।
रास्ते में बुलेट बंद होने की वजह से हलाकान बड्डन ,2 टन की बुलेट को घसीटते हुए, कहते रहे "चालू होजा, तू जानती नहीं मैं कौन हूँ" । थोड़ी दूर बुलेट सुधरवाने के बाद, बड्डन फिर गति पकड़ते ही हैं की अचानक सामने से आ रही महिंद्रा "बिलोरो"" से उनकी बुलेट की जबरदस्त भिड़ंत हो जाती है, बुलेट को तोह कुछ नहीं होता परंतु बिलोरो का बाँया हिस्सा पूर्णतः बिलुर जाता है, थोड़ी से चोट से और हलाकान बड्डन तकिया कलाम का बवंडर पैदा करते हुए , ड्राईवर की जोरदार पिटाई करते हुए बिलोरो को भी तहस नहस कर देते हैं। बिलोरो के अंदर बैठा दंपति बुरी तरह सहम जाता है।
खुद को शांति मिलने के बाद बड्डन आगे बढ़ते हुए, हॉस्पिटल के गेट पर पहुँचते ही हैं की पीछे से "डू नॉट डायल 100" से उतरे पोलिसकुकर्मि "पस्तराम" और "घूस गैंडाम" बड्डन की कालर पकड़ते हुए , गाडी में बिठाकर उन्हें थाने में लाकर बंद कर देते हैं।
तकिया कलाम का रट्टा लगाते हुए बड्डन थाना इंचार्ज "बेताल सिंह" को अपना परिचय देते हैं की वो " कुत्तर गधानसभा क्षेत्र" की "केला खाओ" पार्टी के मेधावी कार्यकर्ता हैं। यह सब सुनकर आक्रोशित बेताल सिंह , बड्डन की जोरदार मालिश करवा देते हैं। बड्डन अपना मोबाइल फ़ोन "मतरोला" निकालते हैं, लेकिन भिड़ंत के दौरान वो भी तहस नहस हो चुका रहता है।

पहचान
हस्यमेव जयते (अंतिम भाग)
,,,,,,पूरे 48 घंटो के बाद और किसी के छुड़वाने तोह दूर, मिलने भी न आने पर बड्डन की चिंताएं बढ़ जाती हैं। लाख माफियां मांगने के बाद भी बड्डन पर कोई रहम नहीं बरता जाता। अपने तकिया कलाम से मजबूर बड्डन उसे दोहराता रहता, पक चुके कानों से परेशांन पस्तराम बड्डन को बताता है की
"तू कौन है ये तोह मुझे नहीं मालूम , पर तू नहीं जानता की तूने किसकी गाड़ी क्षतिग्रस्त की है , सवालिया निशान लिए बड्डन पूछता है किसकी ? पस्तराम उसे बताता है की वो बड्डापुर के "कमिश्नर" श्री "प्रदीप खेडेकर" की गाडी थी। और तुझे अब ब्रम्हा भी नहीं बचा सकते । बड्डन की साँसे हलक में रुक जाती है।
आख़िरकार पाँचवे दिन पस्तराम लॉकर का दरवाजा खोलता है और बड्डन को बाहर आने कहता है , सीना ताने बड्डन तकिया कलाम जड़ता ही है की पस्तराम उसे बताता है की तुम्हे कोई छोड़ा वोडा नहीं जा रहा , तुम्हारी माँ का देहांत हो गया और 3 घंटे के लिए अंत्येष्टि के लिये ले जाया जा रहा है।
घाट पहुँचते ही माँ के पार्थिव और अग्नमग्न शारीर से उठती लपटें , बड्डन को पहली बार उसकी असली """""पहचान"""" बता रहीं थीं।
जिसे महसूस कर बड्डन को एहसास हुआ की "वह कौन है"।
विकास पाण्डेय (२०/०८/२०१६, ०३.२९)