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Wednesday, August 31, 2016

प्रैक्टिकल; practical


सन् 2009

"3 इडियट्स" , भोपाल की राज टॉकीज़ में देखकर , "बी. फार्मा" के पांचवे सेमेस्टर का छात्र "सत्या" बाहर निकला। कॉलेज की क्लासों और लैबों में प्रॅक्टिकल्स के दौरान शिक्षकों और संभंधित विषयों का असर भले ही सत्या पर भित्ते भर न हुआ था, पर फ़िल्म में "आमिर" के किरदार और फ़िल्म का "मेसेज" सत्या की रगों में उतरने जा रहा था।

फ़िल्म में दिए गए मेसेज "की मनपसंद और स्वनिशीथता देने वाली क्रिया को जज्बे का रूप देते हुए कैरियर बनाये", के चिंतन में डूबा सत्या "छिंदवाड़ा" से भोपाल न सिर्फ डिग्री बल्कि अपने पूरे परिवार का सपना पूरा करने आया था।

मध्यमवर्गीय सत्या के परिवार के मुखिया "पिताजी" की सारी उम्मीदें सत्या पर इसलिए पुरजोर थीं, क्योंकि उन्हें यह पूरा विश्वास था की सत्या जल्द ही डिग्री ख़त्म करके , किसी अच्छी नौकरी हासिल कर परिवार में अपनी दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी उठाने में उनकी मदद करेगा।

सत्या के बचपन का मित्र और वर्तमान बैचमेट अरविन्द उसे फ़ोन पर कॉलेज की समस्त गतिवान गतिविधियों से अवगत कराते हुए यह बताता है की वर्तमान सेमेस्टर तेजी से अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, जिसमे की सत्या की अब तक की शून्य प्रतिशत उपस्थिति की वजह से शायद उसे परीक्षा फॉर्म भरने नहीं दिया जाएगा। अतः उसका सभी क्लासेज और प्रॅक्टिकल्स में उपस्थित होना बेहद अनिवार्य हो गया है।
अरविन्द की सूचना और पिताजी के आक्रोशित चेहरे की छवि उकेरे सत्या अगली ही सुबह , अपने विचार, मंथन और कल्पनाओ को बैग में लादते हुए कॉलेज पहुँचता है।

लैब में पहुँचते ही , सत्या की पिछले सेमेस्टरों की उपस्थिति एवं बेहतरीन प्रदर्शन की तुलना में वर्तमान सेमेस्टर में आये अचानक जबरदस्त गिरावट को ध्यान में रखते हुए सत्या के सभी सहपाठी और सेमेस्टर के फार्मसूटिक्स के शिक्षक सत्या को स्तब्ध निगाहों से देखते हैं।

कुछ देर की समझाइश के बाद प्रैक्टिकल शुरू होते ही, सत्या के कानों में प्रैक्टिकल सम्बंधित प्रश्न पड़ता है , की "पेरासिटामोल" ड्रग (दवा) की "सोल्युबिलिटी" (घुलनशीलता) निकाल कर लाओ?।

फिल्मों की खुमारी सत्या पर इस कदर छाई रहती की शिक्षक द्वारा पुछा गया प्रश्न उसे फ़िल्म "कोई मिल गया" के एलियन द्वारा भेजे गए कोडवर्ड सा प्रतीत होता।
और फलस्वरूप ड्रग की सोल्युबिलिटी वह तब निकाल पाता जब उसे सोल्युबिलिटी शब्द का मतलब मालूम होता।
कुछ ही देर में , लैब से बाहर निकाले जाने पर सत्या वापस अपने चिंतन में डूब जाता ।

जहाँ एक तरफ लैबों और क्लासों से बाहर निकाले जाने का सिलसिला सत्या पर गहरा असर डाल रहा था वहीँ दूसरी ओर फिल्मों की काल्पनिक दुनिया की तरफ सत्या का रुझान बढ़ता ही जा रहा था।

3 इडियट्स के मेसेज को ठीक से समझने के लिए सत्या बार बार वह फ़िल्म देखता, भोपाल में रूम और मेस के खर्चों के साथ साथ टिकटों का बोझ घर से पिताजी द्वारा भेजे हुए सीमित पैसों पर भारी पड़ता जोकि सत्या को अपनी कोर्स की कुछ महत्वपूर्ण किताबों को बेचने तक मजबूर कर देता।

जब जब अरविन्द सत्या से परीक्षाओं में आने वाले विषय संबंधी प्रश्न पूछता, तब तब सत्या फ़िल्म के मैसेज को दोहराते हुए खुद से सवाल जवाब करता, "की मैं वहीँ करूँगा जो मुझे अच्छा लगता है, मुझे ख़ुशी देता है, आखिर वह है क्या??

सवालों के समुद्र में गोते लगाते हुए सत्या कई सवाल खुद से करता जैसे :-
1. मुझे फ़िल्म देखना बहुत पसंद है, पर फ़िल्म देख देखके कैरियर बन सकता है क्या, नहीं नहीं !!
2. मुझे सोना बहुत पसंद , पर सोके कैरियर , नहीं!!
3. क्रिकेट बहुत पसंद है, पर विक्रम भैया 10 सालों से संघर्ष कर रहे हैं , नहीं इसमें भी मजा नहीं!!
गेम खेलना, दोस्त बनाना वगेरह जैसे अन्यागिनत सवालों की कड़ी अचानक तब टूटी , जब उसे ख्याल आया की मुझे सुपरबाइक्स चलाना बहुत पसंद है , और आजकल बाइक मॉडिफिकेशन का चलन भी जोरों पर है । इस क्षेत्र में मैं जरूर कुछ कर सकता हूँ , और इस कुछ का जवाब खोजने की लालसा ने सत्या के दिलो दिमाग में तूफ़ान पैदा कर दिया।

बस अपने इस जुनून और अरविन्द की पैशन प्लस (जिसमे 20 का पेट्रोल डला था) की थाकी चाबी लेते हुए और 3 इडियट्स का सुप्रसिद्ध गाना
"सारी उम्र हम मर मर के जी लिए"
रस्ते भर गाते हुए सत्या पुराने भोपाल में मोती मस्जिद के पास स्थित वसीम भाईजान के "रेंजर गेराज" में काम सीखने पहुँच गया।

वसीम भाई के बाइक मॉडिफिकेशन के चट्टानी तजुर्बे के सामने "हार्ले डेविडसन" के चीफ ऑटोमोबाइल engineers भी फेल थे।

सत्या से रूबरू मुखातिब और उसके हुलिये को टटोलते हुए भाईजान हिदायत दी की जिन हाथों में कॉपी और किताब होनी चाहिए ,उनमे पाना और पिंचिस शोभा नहीं देंगे, अतः वो वापस चला जाए।

लेकिन सत्या कहाँ मानने वाला था, और कई दिनों की मशक्कत और सत्या की जिद के सामने आख़िरकार भाईजान को मजबूर होकर उसे 2000 रु मासिक का काम देना पड़ा।

अपनी गति से गतिवान समय आगे बढ़ता रहा, एक तरफ लैबों में बीकरों की खन ख़न होती रही और दूसरी तरफ नटों और बोल्डरों की टन टन चलती रही। पाँचवे सेमेस्टर तक की जमा फीस, नाम के आगे डिग्री, और पिताजी का भय सत्या को मजबूरन कॉलेज खींच खींच कर लाता रहा ।

दैनिक दिनचर्या में सुबह के 10 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक कॉलेज और 6 बजे से लेकर रात के 11.30 बजे तक गेराज का काम सत्या की सेहत पर धीमा जहर घोलना शुरू कर रहा था।

तेज पर दिशाहीन बुद्धि के चलते , कभी ग्रेस, कभी सैम बैक और कभी सब्जेक्ट बैक जैसे परिणामों के साथ सत्या जैसे तैसे आठवें सेमेस्टर तक पहुँच गया।

तकरीबन 13 महीनो तक गेराज में कड़ी मशक्कत करने के बाद कोई सफलता न मिलने पर, और स्वास्थ्य पर गम्भीर असर होने की वजह से सत्या को काम छोड़ना पड़ा।

सन् 2012
आख़िरकार वो दिन आया जिसका हर छात्र को इंतज़ार रहता है, जिंदगी की पहली डिग्री का हाथों में होंना। सभी सहपाठियों की तरह अरविन्द ने भी अपने लिये भविष्य की तैयारियां रखी थीं। उसने अपने मित्र सत्या को बताया की प्रधान मंत्री छात्रवृति योजना के तहत उसने छंदबद्ध परीक्षा पास कर ली है और अब आगे की पढ़ाई के लिए वह "बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय" जा रहा है। अपने मित्र जिसने अभी तक सत्या का हर कदम साथ दिया , से बिछड़ते हुए सत्या के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट रहा था।

13 महीनो का गेराज का अपशिष्ट अनुभव
पिताजी की प्रकोपि उम्मीदें
और
बी.फार्मा की डिग्री के मूलतत्व ज्ञान का सिद्धहस्त अभाव। सत्या को न ही सिर्फ आगे पढ़ने के लिए रोक रहा था बल्कि किसी रोजगार को तलाशने के लिए बलपूर्वक विवश भी कर रहा था।

सेकंड डिवीजन की डिग्री हांथों में लिए सत्या फार्मा के हर क्षेत्र में नौकरी के लिए प्रयास करता है। मार्केटिंग, प्रोडक्शन वगेरह मैं कार्यरत सीनियर्स की सिफारिशें भी नाकाम रहती।

आख़िरकार थक हारकर , सत्या अपने दूर मौसाजी जो की भोपाल में ",अखिल भारतीय तकनिकी शिक्षा संस्थान" में सीनियर सुपरिन्टेंडेंट के पद पर कार्यरत थे के घर अपनी उम्मीदों के साथ पहुँचता है।

सत्या की तीक्ष्ण जिज्ञासा और भावनाओ को देखते हुए वे अपने करीबी मित्र "अशोक" जो की मंडीदीप स्थित "लुपिन फार्मास्युटिकल्स" में बतौर "क्वालिटी कण्ट्रोल मैनेजर के रूप में कार्य कर रहे थे, को फ़ोन करके सत्या की जॉइनिंग के प्रबंध का आग्रह करते हैं।

औपचारिक इंटरव्यू में बेहद ख़राब प्रदर्शन के बावजूद अशोक सत्या की जॉइनिंग क्वालिटी कण्ट्रोल विभाग में ट्रेनी के रूप में सत्या के मौसाजी को यह संकेत देते हुए करवाते हैं की अब यहाँ से सत्या की मेहनत और उसका प्रदर्शन ही उसे आगे ले जा सकेगा। अगर सत्या अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका तोह कंपनी की पॉलिसीस को मद्देनज़र रखते हुए वह भी कुछ नहीं कर सकेंगे।

कंपनी के विभिन्न विभागों में एक महीने के इंडक्शन प्रोग्राम के उपरांत , सत्या qc विभाग में अपने पहले दिन की शुरुआत करता है। और पहले ही दिन qc विभाग के सीनियर एनालिस्ट "प्रदीप" संजोगवष सत्या को वही सवाल जड़ देते हैं , जो उससे 2 साल पहले फार्मसूटिक्स के शिक्षक ने कॉलेज की लैब में पूछा था।

मिस्टर सत्या अपनी कंपनी में बनने वाली (methergine)टेबलेट्स का बैच तैयार हो रहा है, इसकी क्वालिटी को सुनिश्ति करने के लिये रैंडमली चुने गए सैंपल्स के परिक्षण हेतु पैरामीटर्स जैसे सोल्युबिलिटी , वेट वेरिएशन ड्रग प्रोफाइल वगरैह रिपोर्ट्स निकालकर मुझे आज दोपहर 2.00 बजे तक जमा कीजिये। ,,,,,,,

हुआ वही जिसका सवाल सुनते ही सत्या को डर था। दोपहर से रात के 2.00 बज गए पर रिपोर्ट का कोई अता पता न चला I

बीतते समय के साथ, सत्या की अन्यागिनत गलतियों और लापरवाहियों को प्रदीप की कम्प्लेंट्स हवा देती रहीं, जांच परिक्षण हेतु इंस्ट्रूमेंट्स से लदे क्वालिटी कंट्रोल के चैम्बर में सत्या की 9 घंटे की एक एक शिफ्ट एक एक साल की तरह बीत रही थी ।
सौंपा गया हर एक कार्य , सत्या का जीना दूभर कर रहा था।

आख़िरकार पहाड़ जैसा महीना बीतने के बाद , अशोक ,सत्या के मौसाजी को इत्तला करते हुए ,सत्या को मजबूरन उसका टर्मिनेशन लैटर हांथों में थमा देते हैं ।

पिछले 2 सालों में बीते वक़्त का फ्लैशबैक याद करते हुए दुखी सत्या , रूम पहुंचता ही है की , फ़ोन की घंटी पर बनारस से अरविन्द सत्या को याद करता है। बहते हुए अश्रुओं के साथ सत्या अरविन्द को कंपनी में बीते अनुभवों को बताते हुए ,यह कहता है की.......

अध्ययनकाल के दौरान पनपते बारूदी कैरियर को उसने खुद ही अपनी फ़िज़ूल की महत्वकांषाओं की चिंगारी से जलाकर राख कर दिया है।

3 इडियट्स तोह सन् 2009 में आई थी , पर उसके मैसेज को तोह उसने सन् 2007 में अपना पसंदीदा पाठ्यक्रम "बी.फार्मा" चुनकर कार्यान्वित किया था।

माता पिता को फ़ोन और घर पर और कॉलेज के शिक्षकों को लैबों और क्लासों में प्रॅक्टिकल्स/क्लासेज के दौरान , सत्या अपने झूठ और छलावे की अठखेलियां दिखाकर स्वैर कल्पनाओं की सवारी तोह करता रहा।

पर असल ज़िन्दगी के महज एक प्रैक्टिकल ने उसकी सोच और आत्मा को झकझोर कर रख दिया।

क्वालिटी कंट्रोल विषय संभंधित की जी तोड़ पढ़ाई कर, सत्या , वापस कंपनी में नौकरी पाने की सौगंध लेता है।


विकास पाण्डेय (३१/०८/२०१६)