सफ़ेद होंडा सिटी में लगे केनवुड के शानदार म्यूजिक सिस्टम की प्ले बटन दबाते हुए , ऑफिस से रात 10 बजे थके हारे लौट रहे 39 वर्षीय "वीरेंद्र कुमार" , जगजीत सिंह की सुप्रसिद्ध और एकमात्र तेज गति वाली गजल "चाक जिगर के सी लेते हैं" लगाते हैं।
गजल का मधुर संगीत, नेशनल हाईवे क्रमांक 148A पर अगस्त के अंत की रिमझिम बारिश, और स्टोवेज में रखा कारल्सबर्ग का बड़ा कैन, कुमार साब की दिन भर की थकान मिटाने की तय्यारी कर रहे थे।
गजल की 3 पंक्तियाँ भी ख़त्म नहीं हुईं थीं की, स्पीकरो पर फ़ोन की घंटी बज पड़ती है, जिस पर कुमार साब के सीनियर "नायरजी" निर्देश देते हैं की उन्हें प्रोजेक्ट के सिलसिले में कल सुबह पुणे निकलना होगा, टास्क और फ्लाइट टिकट्स मेल कर दी गयीं हैं। गाड़ी किनारे लगाकर आक्रोशित कुमार साब मेल चेक करते हैं, जितनी तेजी से मेल पढ़कर उनका आक्रोश चढ़ता है उतनी ही तेजी से मेल में लिखे आखिरी सन्देश को देखकर न ही सिर्फ शांत होता है बल्कि कुमार साब को उत्साहित भी कर देता है, मेसेज के आखिरी भाग बताता है की कंपनी के एम्प्लाइज कुमार साब के ट्रेनिंग सेशन के लिए काफी रुचिवान् हैं जिसका उन्हें बेसब्री से इंतज़ार है।
हलकी मुस्कान लिए और अपनी ज़िन्दगी के अब तक के सफ़र की याद करते हुए कुमार साब घर की और आगे बढ़ते हैं।
"वीरेंद्र कुमार" ......उत्तर प्रदेश के "आजमगढ़" जिले की "लालगंज" तहसील के "सर्रा" गाँव में रहने वाले एक गरीब परिवार से थे।
बड़ा आदमी बनने के सपने और मजबूत इरादों को लिए वीरेंद्र ने असीम कष्टों से भरा बचपन पार किया था। लालगंज से हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद, वीरेंद्र ने छोटी मोटी नौकरी कर "बनारस हिन्दू विश्विद्यालय" से बी. कॉम की पढाई पूर्ण की थी। जिसके उपरांत पुणे की छोटी मोटी कंपनियों में अकाउंटेंट की नौकरी करते करते पुणे के ही एक प्राइवेट कॉलेज से एम. बी.ए (मार्केटिंग) की डिग्री प्राप्त की थी , जहाँ उन्हें अपनी जीवन साथी "नंदिनी" भी मिली थीं, जो की सदृश्य रूप से एम. बी.ए (hr) की पढ़ाई कर रही थीं।
बढ़ते समय और कड़ी मेहनत के साथ खुदको को सफल पद और उचाईयों पर देखने का सपना वीरेंद्र ने पूरा भी किया था, जो की गुड़गांव के महरौली के ग्लोबल पार्क में स्थित yyk इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बतौर मार्केटिंग हेड के पद पर कार्यरत वीरेंद्र साब की पोस्ट से साबित होता था।
बीते वक़्त की याद करते और ड्राइव का आनंद लेते हुए वीरेंद्र महरौली से कुछ 21km की दूरी पर स्थित पायनियर पार्क के अपने फ्लैट पहुँचते हैं, घर पर नंदिनी (जो की "रैनबैक्सी फार्मास्युटिकल्स में hr मेनेजर थीं) और 10 वर्षीय बेटा अर्जुन रहते थे।
नायर साब के निर्दशानुसार पुणे के हिंजेवाडी इलाके में राजीव गांधी आईटी पार्क में स्थित "कॉग्निजेंट" कंपनी की यात्रा के बारे में नंदिनी को बताकर वीरेंद्र प्रेजेंटेशन की तैयारी में जुट जाते हैं। अगली सुबह निकलते वक़्त नंदिनी ,वीरेंद्र को इतना ही कहतीं की !....वे अपनी "टाइमिंग" का ध्यान रखें।
6 फुट की एथलेटिक कद काठी वाले वीरेंद्र साब ने बहुत मेहनत से मार्केटिंग और प्रेजेंटेशन की लाजवाब कला को अद्भुत रूप से अपने अंदर विकसित किया था। वीरेंद्र साब से पहली मुलाकात का फर्स्ट इम्प्रैशन इतना प्रभावशाली रहता था की उस्की छवि मिलने वाले पर जीवन भर रहती।
अपनी कला और 15 सालों के कॉरपोरेट लाइफ के अनुभवों को पहचान कर एवं उन्हें तराशकर, वीरेंद्र साब विगत 10 वर्षों में विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनियों में "मैनेजमेंट इन कॉर्पोरेट लाइफ" पर लेक्चर सेशन देते आ रहे थे, जो की उनके मूल कार्यों से हटकर एक विशेष हॉबी के रूप में उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।
उनके प्रेसेंटशन्स मुख्य रूप से :-
# स्ट्रेस मैनेजमेंट (तनावमुक्त वातावरण)
# सेल्फ डिसिप्लिन (स्वानुशासन)
# टाइम मैनेजमेंट (वक़्त प्रबंधन)
# सक्सेस सीक्रेट्स (सफलता की कुंजी)
इत्यादि पर आधारित रहते थे।
वीरेंद्र साब की लिखी कुछ किताबें जैसे,
# कॉर्पोरेट विक्ट्री
# डोंट गेट annoyed !
# व्हाई स्ट्रेस , व्हेन there इस रिलैक्स?
ने प्रोफेशनल एम्प्लॉयीज और नौजवान यूथ जो की एम. एन. सी कंपनियों में नौकरी के सपने देख रहे थे , के बीच धूम मचा रखी थी।
उपर्युक्त सभी विषयों पर अपने निराले अंदाज में पेश करने की वजह से, वीरेंद्र साब की लोकप्रियता कॉरपोरेट्स में बढ़ती ही जा रही थी। कई ऐतिहासिक सेशंस की कड़ी में अगला पड़ाव , पुणे की कॉग्निजेंट का था।
अपने प्रामाणिक कार्यों के समाप्तिकरण के उपरांत, वीरेंद्र साब के उस मोटिवेशनल सेशन की बारी थी, जिसका कॉग्निजेंट के एम्प्लाइज को बेसब्री से इंतजार था। सेशन के निर्धारित समय 2 बजे के अनुसार सभी एम्प्लॉइज सेमिनार रूम में एकत्रित हो चुके थे !
कई सालों से सीखने हेतु, राष्ट्रीय स्तर के मेंटर्स, मोटिवेशन स्पीकर्स, उत्कृष्ट शख्सियतों इत्यादि के सेशंस, शोज़ को फॉलो करते और भारतीय नागरिक की औसत मानसिकता को मद्देनजर रखते हुए वीरेंद्र साब ने एक अजीबोगरीब धारणा अपने अंदर बहुत दृढ़ रूप से बना ली थी, की जिस तरह मुसाफिर के लिए धुप के बाद ही छाँव का आनंद है, उसी तरह थोड़े से इंतेजार के बाद ही श्रोताओं के लिए सेशन की प्रबलता का एहसास है.................वीरेंद्र साब को हर सेशन के पहले अपने कॉलेज के दिन और कुछ बेहद असरदार वाक्ये याद आ जाते की कैसे "जगजीत सिंह" के शोज में घण्टो की इंतेजार के बाद जब वे मंच पर आते, उनके आगमन से भीड़ में उत्साह का उत्सव बस देखते ही बनता था।
इन्ही कुछ अनुभवों के मिश्रण को वीरेंद्र साब ने अपने सेशन में "पब्लिक कांशसनेस" या सरल शब्दों में कहें तोह "माहौल खिचना या मौसम बनना" का नाम देकर उतार लिया था।
इसी कांशसनेस को ध्यान में रख "वीरेंद्र साब" अपने हर सेशन या हर स्पीच से पहले, श्रोताओं को जानबूझकर थोडा इंतेजार कराते। "कॉग्निजेंट" में भी यही हुआ, 2 बजे की जगह 2 बजकर 40 मिनट पर वीरेंद्र साब ने जैसे ही सेमिनार हाल में एंट्री की, तालियों की गड़गड़ाहट ने उनकी रगों में उत्साह भरते हुए, कांशसनेस पर विश्वास को और प्रबल कर दिया। ...........
एक और शानदार सेशन 3 घंटे के उपरांत समाप्त हुआ, अंत में एम्प्लॉइज के साथ पारस्परिक प्रश्न उत्तर के दौरान किसी के "टाइम मैनजमेंट" पर सवाल पूछने पर वीरेंद्र साब ने काफी अच्छी स्पीच दी।
सभी संतुष्ट, उत्साहित, एम्प्लॉइज वीरेंद्र साब की तारीफों के पुल बांधते और उनके लेट एंट्री लेने पर कुछ कटाक्ष करते हुए बहार आ गए।
एक से एक हैरतंगेज सेशंस के सिलसिलों में कुछ नंदिनी की रैनबैक्सी कंपनी में सदृश्य रहे, हर सेशन में अपनी लेट एंट्री की गलत को लेकर नंदिनी , वीरेंद्र साब को टोकती रहतीं। परंतु अपनी हाजिरजवाबी के बेहतरीन हुनर से वीरेंद्र साब नंदिनी को निशब्द करते रहे।
दोनों के बीच हर तर्कसंगति का अंत नंदिनी की वाक्य से होता की "आप अपनी हर मोटिवेशनल क्लास में टाइम मैनेजमेंट पर लेक्चर तोह दे देते हैं पर खुद लेट एंट्री लेने का श्रोताओं पर पड़ रहे गलत असर को आप शायद देख नहीं पा रहे", इसे सुधारिये वरना यह छोटी सी गलती आप पर एक दिन भारी न पड़ जाए।
अपनी गति से गतिवान वक़्त वीरेंद्र साब की लोकप्रियता को कॉरपोरेट्स से आम जनता के बीच भी लाने लगा था। धीरे धीरे वीरेंद्र साब की छवि एक विस्मयकारी मोटिवेटर के रूप में चहुँओर फैलने लगी थी।
और धीरे धीरे वक़्त के ही साथ ,आख़िरकार वीरेंद्र साब की जिंदगी में वो दिन आ गया, जिसका उन्हें अत्यंत सरगर्मी से इंतेजार था,
एक बड़ा मंच.....................
हज़ारों लोगों की भीड़ .................................
और मंच पर अकेला................. " वीरेंद्र कुमार"!!
वीरेंद्र साब को पार्टी प्रचार का जरिया बनाने के लिये और युवाओं का उत्साहवर्धन हेतु, चुनावी दंगल की सरताज, उत्तर प्रदेश की "समाजवादी पार्टी" के संस्थापक एवं नायक "मुलायम सिंह यादव" के पुत्र और उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर "अखिलेश यादव" के लैटर हेड पर छपा "सी. एम हाउस" का न्योता आया था।
अपने ही गृह राज्य द्वारा इतने बड़े सत्कार की अनुभूति से वीरेंदर साब की रगों में उत्साह का तूफ़ान था लोकल न्यूज़ चैनल, अख़बार, बैनर/होअर्डिंग्स, पैंफ्लेट्स एवं अन्य इत्यादि मीडिया पर वीरेंद्र कुमार के स्पीच के विज्ञापनों की हुंकार से वीरेंद्र और नंदिनी दोनों उत्साहित थे।
स्पीच का दिन आया, एंट्री/vip पास लिए लोग ऑडिटोरियम में एकत्रित हो चुके थे। इत्तेफ़ाकन उस दिन भी वक़्त दोपहर 2 बजे का था। अपने पब्लिक कांशसनेस वाले फैक्टर के अनुसार " वीरेंद्र कुमार" ने मंच पर 3.15 बजे एंट्री ली , 3000 से ज्यादा की भीड़ की तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल "विरेंद्रमय" हो चूका था। जिंदगी में "पहली" बार इतने बड़े मंच के संचालन की जिम्मेदारी को महसूस कर वीरेंद्र साब काफी अधीर लग रहे थे।
कार्यक्रम तालिका के अनुसार आम जनता के साथ साथ विशिष्ट शख्सियत जैसे ,
# राष्ट्रस्तरीय ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मनोहर बत्रा,
# दैनिक भास्कर समूह प्रमुख श्री नरेंद्र अग्रवाल,
# हिंदुस्तान लीवर प्राइवेट लिमिटेड प्लांट डायरेक्टर श्री अरविन्द शेट्टी
# बनारस हिन्दू विश्विद्यालय कुलपति श्री सूर्यमणि उपाध्याय
इत्यादि भी उपस्थित हो चुके थे,
परंतु ! चीफ गेस्ट एवं कुछ अति विशिष्ट शख्सियतों का आगमन शेष था।
दीप प्रज्जवलन, पुष्प गुच्छ आदन प्रदान के उपरांत तकरिबन 3.55 पर वीरेंद्र अपना सेशन शुरू करते हैं, जिसकी उन्होंने पिछले 3 महीनो से रात दिन मेहनत की थी, जो की श्रोताओं पर असर भी दिखा रही थी। विषय "मोटिवेशन" पर एक से बढ़कर एक, वाक्यांश, जुमले, तकनिकियां, उदाहरण और अपने अंदाज -ए-पेशकश की रेसिपी से वीरेंद्र कुमार ने महज 35 मिनट में ही श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते हुए उनके बीच अपनी जबरदस्त पकड़ बना ली थी।
सेशन अपनी लय से आगे बढ़ रहा था, तैयारी के मुताबिक सेशन के एकदम बीच का एक घंटा, वीरेंद्र ने एक ,,,,व्हाक्या के लिए सेट किया था,,,,,,,,,, व्हाक्या,,,,,वीरेंद्र कुमार की जीवनी से ही सम्बंधित था, जिसमे वीरेंद्र अपने संघर्ष की दास्ताँ से श्रोताओं को प्रेरित करने वाले थे।
इस व्हाक्या की पेशगी के लिए, बिना किसी रुकावट की एक समान लय, पूर्णतः संकेंद्रित अंदाज-ए-बयां और एक सतेज से सन्नाटे की सख्त जरुरत थी, क्योंकि वीरेंद्र कुमार के अनुसार यह व्हाक्या ही उनके पूरे सेशन की "जान" था।
वक़्त के अनुसार वीरेंद्र अपने ,,,,व्हाक्या की शुरुआत ठीक 4.55 पर करते हैं,,,,,,,,,,,,,,,,, की "दोस्तों",,,,,,,,!,,,,,,,,आज से ठीक 20 साल पहले की बात है,,,,,,,,,,,,!!!,,,,,, (श्रोता भी ध्यानकेंद्रित)........ ..........इतनी पंक्तियाँ शुरू ही होती है की,,,,,,
चीफ गेस्ट का काफिला वहां पहुँचता है,,,,,, जिसमे सबसे पहले ,,,श्री "धर्मेन्द्र यादव (युथ लीडर, समाजवादी पार्टी) ऑडिटोरियम में एंट्री लेते हैं,,,,,,, स्वागत के लिए सभी खड़े हो जाते है,,,,,लोगों का पूरा ध्यान श्री धर्मेन्द्र पर आकर्षित हो जाता है,,,,,शख्सियत को ध्यान में रखते हुए,,,,,वीरेंद्र कुमार भी श्री धर्मेन्द्र का स्वागत करते है, पुष्प गुच्छ आदान प्रदान होता है ,,,,,और इन सब क्रिया कलाप में लगभग कुछ 15 मिनट लग जाते हैं, जिससे वीरेंद्र थोडा "क्रुद्ध" महसूस करते हैं,,,,, श्री धर्मेन्द्र के सीट पर स्थापित होने पर,,,,,,,
वीरेंद्र ,,,,,,5.20 पर एक बार फिर अपनी पंक्तियाँ दोहराते हुए अपनी लय में वापस आने की कोशिश करते हैं,,,,,, तोह दोस्तों ! आज से ठीक 20 साल पहले की बात है ,,,,,,जब मैं लालगंज के स्कूल से अपने घर लौट रहा,,,,,,,(लालगंज का नाम आते ही तालियों की गड़गड़ाहट होती है),,,,,,,,,घर पहुँचते ही मैं देखता हूँ की,,,,,,,,,,,,,,,,,, (इतनी पंक्तियां होती ही हैं की) ,,,,,,,,,,
अचानक,,,,,,,5.30 पर श्री "नरेश चंद्र उत्तम" (विधायक, समाजवादी पार्टी) , भवन में प्रवेश करते है,,,
जाहिर था बड़ी शख्सियत थी, तोह स्वागत भी "ज्यादा" जोरदार होना था,,,,,,,,
फूल माला , 10 मिनट के पार्टी की उन्नति का छोटा भाषण, आदि इत्यादि के बाद उत्तमजी भी सीट ग्रहण करते हैं,,,,,
वीरेंद्र ,,,,,क्रुद्ध से,,,,,,,,अब हतोत्साहित होने लगे थे,,,,,
5.30 से 5.55
5.55 से 6.15 और
6.15 से 6.45
तक पार्टी की विशिष्ट शख्सियतों के बारी बारी से होते हुए आगमन से ,वीरेंद्र का हौसला पूरी तरह पस्त होने लगता है,
सेशन में समां बाँधने के लिए जिस लय और ताल की उन्हें सख्त आवश्यकता थी ,वो वीरेंद्र के मुताबिक कहीं पूरी तरह खो जाती है।
मन की खीज, क्रोध, चिड़चिढ़ेपन्, कुंठा, नैराश्य और डगमगाए हुए हौसले को जैसे तैसे सँभालते हुए विरेंद्र ,,,,,,,,ठीक 6.45 पर एक आखिरी कोशिश करते ही हैं की ,,,,,,,,
अचानक ...................................
श्री रामगोपाल यादव (मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट) की एंट्री होती है, ...........................!
पुष्प माला इत्यादि के साथ साथ , ढोल नगाड़े ऑडिटोरियम की शान्ति भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, यह सब देखते हुए, मुख पर बेहद झूठी हंसी और मन में आक्रोश की सुनामी लिए वीरेंद्र,,,,,,,पूरी तरह निशब्द महसूस करने लगते हैं।
जो व्हाक्या पूरे सेशन की जान था , और जिसे 4.55 पर शुरू होकर 5.40 तक ख़त्म हो जाना था,
वो,,,,,,,,,,7.15 तक ख़त्म तोह क्या ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया था।
इस बात का एहसास वीरेंद्र के दिलो दिमाग पर बुरी तरह प्रहार कर रहा था।
खुद को महज एक पुतला जैसा प्रतीत कर रहे वीरेंद्र मन ही मन जान चुके थे की , अब उनसे वह व्हाक्या पूरा नहीं किया जा सकेगा, इसलिए उसे अब आगे बढाने की जरुरत नहीं।
यादवजी के सेटल होते ही , अंततः , माहौल एक बार फिर शांत होता है,
सारी निगाहें एक बार फिर वीरेंद्र पर,
! पर इस बार , कालर माइक को धीरे से उतारते हुए , टाई को ढ़ीला करते हुए, और 22 डिग्री में भी पसीने से लथपथ चेहरे को पोंछते हुए , वीरेंद्र नीचे सर किये चुपचाप खड़े रहते हैं।
मुख मानो सुन्न पड़ गया था।
मष्तिक विचारों के संकेत भेजना बंद कर चूका था।
चेहरा सफ़ेद पड़ चूका था।
जल ग्रहण का ब्रेक काम नहीं आ रहा था।
निशब्द खड़े वीरेंद्र को सबसे आगे की सीट पर बैठी नंदिनी इशारों से आगे बढ़ने का प्रोत्साहन कर रहीं थीं। जो की किसी काम नहीं आ रहा था।
लगभग 10 मिनट के इस अंतराल के बाद ,हैण्ड माइक उठाते हुए वीरेंद्र ,कुछ औपचारिक वाक्य कहकर , अचानक , कहते हैं की ,...............................
क्षमा करें , आपका जीवन सुखमय हो, ध्यानवाद।
बस इतना कहकर , वीरेंद्र फ़ौरन मंच छोड़कर , चले जाते हैं।
ऑडिटोरियम में बैठा हर शख्स, बस यही सोच रहा था की यह क्या हुआ?
सभी वी. आई. पी समेत पूरी जनता के आक्रोश का कोई ठिकाना नहीं रहता,
एक एक करके सभी वी. आई.पी बाहर आते हैं, जहाँ मीडिया का हुजूम उन पर टूट पड़ता है। सभी मीडिया पर वीरेंद्र कुमार की कड़ी आलोचना करते है, ..............
उधर, अंदर बैठी जनता, टिकट और पास के पैसे फिजूल होने के आक्रोश से पूरा ऑडिटोरियम तहस नहस कर देती है।
गुस्से से तिलमिलाए धर्मेन्द्र, वीरेंद्र को सबक सिखाने के उद्देश्य से रेस्ट रूम की ओर अग्रसर होते हैं, रूम में पहुँचते ही ,वीरेंद्र की कालर पकड़कर धर्मेन्द्र चेतावनी देते हैं वो अब प्रदेश में कभी शो नहीँ कर पाएंगे। फ़ोन पर उत्तमजी ,धर्मेन्द्र को हिदायत देते हैं , अपने गुस्से पर काबू रखें, यह विपक्षी पार्टी के लिए सियासी मुद्दा बन सकता, वीरेंद्र हमारे राज्य का मूल निवासी है ,उसे छोड़ दो।
वीरेंद्र भी हाँथ जोड़कर माफ़ी मांगते है।
स्थल से फ़ौरन वीरेंद्र , नंदिनी के साथ गाडी में बैठकर निकल जाते हैं। स्तब्ध नंदिनी ,वीरेंद्र का ढांढस बांधती हैं, और ड्राईवर को जगजीत सिंह की गजल लगाने को कहती हैं।
नंदिनी का हाँथ पकड़ते ही , वीरेंद्र अपने अश्रुओं के सैलाब को रोक नहीं पाते।
2 दिन बाद, कंपनी में अपने चैम्बर में पहुंचकर, वीरेंद्र सामने लगी घडी को देखकर, और अब तक का फ्लैशबैक याद करते हुए , सोचते हैं, की किस तरह कॉर्पोरेट के पढ़े लिखे लोगों को मैं इंतेजार कराता रहा।
मैंने टाइम मैनजमेंट पर न जाने "वक़्त" विषय पर कितनी क्लासें ली ,
पर आज वक़्त की एक "क्लास"
ने मेरी सोच, और आत्मा को झकझोर कर रख दिया।
वीरेंद्र अपने आगे के हर सेशन को "वक़्त" पर ख़त्म करने की सौगंध लेते हैं।
विकास पाण्डेय (२४/०९/२०१६)