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Thursday, July 28, 2016

The smart city; स्मार्ट सिटी की यात्रा



रमेश अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई ख़त्म कर चुका था।

किसी तड़के सुबह के अखबार की खबर ने रमेश को चोंका दिया।

छपा था "अब बार्सिलोना की तर्ज पर स्मार्ट बनेगा जबलपुर"।

रमेश असमंजसता से भरकर थोडा उत्साहित हुआ।

फिर मम्मीँ ने आवाज दी , रमेश "चाय पी ली हो तोह बाजार से सब्जी ले आ , जो भी तुझे पसंद हो । आज वही बनाउंगी तेरे लिए।
पापा बोले रमेश ला अखबार दे । पढ़ते पढ़ते बोले बेटा परवल लाना। 

माँ ने कहा रहने दो जी ,कुछ दिनों बाद मेरा बेटा बाहर पढ़ने चला जाएगा ,फिर कौन उसके खाने का ध्यान रखेगा। कम से कम अभी उसे अपने मनपसंद की सब्जियां खाने दो।
,,ठीक है मम्मी मैं आता हूँ।
अरे सुन ये कचरे की थैली भी लेते जा , जगह देखकर कहीं फेक देना।
रास्ते में पास के नुक्कड़ पर जमे कचरे के ढेर के पास कॉलोनी की शर्मा आंटी कचरा फेक रहीं थी।
वहीँ रमेश ने भी अपनी कचरे की थैली डाल दी।
आगे, थोड़ी दूर पर पहचान के बब्लू भैया , सड़क के किनारे लगे पेड़ के नीचे टॉयलेट कर रहे थे।
अरे ! रमेश और क्या हाल हैं। कहकर हाँथ मिलाने के लिए आगे बढे। रमेश ने नमस्ते कर लिया।
और रमेश कब जा रहा है पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए बाहर।
बस कुछ दिनों बाद भैया।

थोड़ी दूर और देर बाद सब्जी मार्किट में रमेश ने देखा , सब्जी के ठेलों के नीचे पिछली रात की बारिश से कीचड और गंदगी बजबजा रही है।
चारों ओर मवेशी सड़ी सब्जियों पर मौज उड़ा रहे हैं।
सब्जी को गौर से देखने पर उनके ताजेपन का इस कदर रमेश पर असर हुआ की उसने पनीर खरीदने की सोची और आगे बढ़ गया।

पनीर तोह नरेंद्र डेरी से ही लूंगा , दूर हुई तोह क्या हुआ पर ताजा तोह मिलेगा।
रमेश ने एक्टिवा का एक्सेलरेटर बढ़ा दिया।

थोड़ी दूर रेलवे फाटक बंद था। ट्रेन के इंतज़ार में रमेश गाडी बंद करके रेलवे की पटरी पर कुछ लोगों को सौच करते देख रहा था।
बायीं ओर कुछ अंकल लोग पिछली रात की बारिश से भरे हुए बड़े से गड्ढे में गिरी हुई आल्टो कार को देखकर चर्चा कर रहे थे
उन्होंने नगर निगम और प्रशासन की जमकर तारीफ़ की और ट्रेन आने के बाद । सिग्नल के उलटे शॉर्टकट रास्ते से निकल लिए।
वक़्त गुजरता हुआ , रमेश के जबलपुर से जाने का पैगाम एक दिन लेकर आया।
रमेश को आगे की पढाई के लिए , विदेश के विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया।
और उसे अब अपने पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए "बार्सिलोना" जाना था।

मुम्बई जाने वाली शाम की 7.30 वाली गरीबरथ मैं बैठे हुए रमेश ने मम्मी पापा से नम आँखों से विदा ली।
बार्सिलोना में पहला कदम रखते ही रमेश की आँखें खुली की खुली रह गयीं। वह अपने जीवन में "स्मार्ट सिटी" पहली बार देख रहा था।

एक रोज विश्वविद्यालय से लौटते वक़्त , रास्ते में रमेश ने नाश्ते के लिए एक बर्गर लिया और उसे ख़त्म करके वहीँ फेंक दिया।

कुछ स्थानीय लोग जो वहीँ खड़े थे उन्होंने रमेश को चेतावनी देते हुए दोबारा ऐसा न करने को कहा।
फिर किसी एक दिन आपा धापी में रमेश को वही गलती दोहराने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। 

जिसकी दास्तां रमेश का सूजा हुआ चेहरा पल पल उसे याद दिलाता रहा की उसे अपने अंदर के स्मार्ट व्यक्ति को छुपाते हुए, बार्सिलोना के रहन सहन अपनाने होंगे।

थोड़े तकलीफदेह थोड़े रोमांच से भरे और गुजरते हुए दिनों के साथ एक शाम , रमेश ने अपने रूम पार्टनर केरल के रहने वाले राजन से थोड़े दुखी अंदाज में एक सवाल किया।

राजन यार यहाँ के लोग इतने सख्त क्यों हैं, मेरी संस्कारधानी में लोगों में कितना प्रेम और कितनी सद्भबना है।
उत्तर में जो राजन ने कहा, उसने रमेश को बार्सिलोना के रहन सहन में ढलने में बहुत तेजी से मदद की, राजन ने कहा! रमेश मैं तुम्हारे सवाल का जवाब भी एक सवाल से देता हूँ,

ये बताओ ,जबलपुर में कहीं कचरा देखकर तुम्हे क्या लगता है, रमेश ने कहा कुछ नहीं ।
पर वही कचरा कोई तुम्हारे घर में फेंके तोह, मैं उसे मार मारकर कचरा बना दूंगा, रमेश ने कहा।

बस यही तोह जवाब है, यहाँ के लोग सख्त नहीं हैं, बस ये अपने शहर और देश से बहुत प्यार करते हैं, इसके हर एक नुक्कड़, सड़क और जगह को अपना घर समझते हैं। बस!
रमेश ,उसी दृष्टिकोण से रहते हुए बार्सिलोना में अपनी पढ़ाई करता रहा और, एक दिन रमेश के जाने का वक़्त आ गया।
रमेश को यूनाइटेड स्टेट्स के फिलाडेलफिया में नौकरी करने का और वहां ज्वाइन करने से पहले अपने "घर" जाने का अवसर मिला।

तीन साल की कड़ी मेहनत और बेहद लंबे अंतराल के बाद ,रमेश अपनी मिटटी अपने लोगों के बीच वापस आया।
जबलपुर स्टेशन का बोर्ड देखकर रमेश फूला नहीं समाया।

घर पर मम्मी के हाँथ की पनीर की सब्जी और पापा का मम्मी को परवल बनाने को कहने को देखकर ,रमेश ने 3 सालों बाद ख़ुशी की सांस ली।
अगली सुबह अपने साथ अखबार लायी, छपा था " कैलिफ़ोर्निया" की तर्ज पर समार्ट बनेगा जबलपुर"।
रमेश ने आक्रोशित हांथों से अखबार के उस आखिरी पन्ने को फाड़ दिया।
मम्मी की दी हुई कचरे की थैली लिए रमेश ,कॉलोनी के नुक्कड़ पर कचरे के ढेर के पास पहुंचा और देखा की समय के साथ साथ कॉलोनी के बच्चों की तरह ये कचरे का ढेर भी कितना बड़ा हो गया है, 

सोचते हुए थोड़ी दूर पर ही लगे नगर निगम के डस्टबिन में रमेश ने कचरा डाला और लौटते हुए देखा की कॉलोनी की शर्मा आंटी वहीँ कचरा फेंक रहीं हैं।

सब देखते हुए रमेश ने भरी हुई आँखों से खुद से एक सवाल किया , 

की क्या ऐसा हो सकता है की मेरे शहर के लोग कुछ समय बार्सिलोना हो आएं???????
फिर वही नरेंद्र डेरी जाते वक़्त ,"जबलपुर के बोर्ड ने इस बार रमेश से कहा।

मैं तुमसे हूँ ,, और तुम मुझसे।
जब तुम स्मार्ट बनोगे तभी मैं!!!!!!!!!!!!!!!! तुम नहीं तोह मैं भी नहीं ,और अगर मैं नहीं तोह तुम नहीं।


##:- जिस तरह ईटों से सिर्फ माकन बनता है , घर नहीं ! उसी तरह स्मार्ट सोच के लोगों के अभाव में शहर सिर्फ शहर रहता है , कोई स्मार्ट सिटी नहीं 

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